5 Ways To Go Out Of Your Mind And Get Happy – Debbie Shapiro

 

Screen Shot 2014-04-13 at 12.13.17 PMYou know what it’s like when you get stressed, as if you’re going out of your mind: “Oh no, I’m losing it, I’m going crazy, I can’t take any more.” And how the more thoughts you have like this the more you’re caught up in the madness and get further away from being peaceful or happy.

The good news is that as long as we know we’re going nuts then we’re ok; it’s when we’re not aware that we’re off keel that it’s more serious. As Ed’s teacher once said: The difference between a yogi and a madman is the yogi knows he’s mad!

There’s no denying the importance and value of the mind—there’s great brilliance, creativity and beauty here—but also great absurdity. For no matter how intellectually astute or inspired we may be, this can have little effect upon the habitual mind and its repetitive patterns of guilt, anxiety, shame, or self-centeredness. The tragedy is when maintaining our dramas, ego-trips, or getting stressed out is seen as some sort of achievement.

So what if going out of your mind was actually the coolest thing to do? What if being out of your mind means you aren’t disturbed by your own madness and are more in touch with your feelings, your heart, even your freedom? What if it means getting away from insecurities, worries, judgments and doubts, away from everything that keeps you scattered and fearful, away from the commotions and stories that reinforce who you think you are?

As the great Zen teacher Alan Watts said, We all need to go out of our minds at least once a day. By going out of our minds we quickly come to our senses.

Meditation really helps here as it’s about calming and making friends with our chattering monkey-like mind while being aware and present in the moment. Being mindful of what we’re doing means that even if we don’t get it right it’s ok, it’s not such a big deal, for we can see that this doesn’t define us, that who we are is more than appearances.

Here are 5 ways to help you go out of your mind and in to real happiness:

1. Pay attention: By being mindful you can witness the madness of your mind without identifying with or becoming it; you see that who you are is more than just your thoughts and feelings

2. Make friends with fear: Being fearful of fear keeps it an enemy, while befriending it turns it to fearlessness

3. Forgive yourself: It’s natural to make mistakes; none of us get it right all the time. Forgiving yourself for being human enables you to let go and move on more quickly.

4. Turn shit into gold: Transform difficult or dark times into rich experiences that generate greater insight and wisdom

5. Meditate daily, even for 5 minutes: It really will change you from being a victim of your own mind into a victor! Then imagine you are free of all the limitations and difficulties you are dealing with, that you’re free of who you thought you were and can now rest in your own beingness. Just close your eyes and know yourself to be completely free with nothing stopping you from being or doing anything. You are happy! You are free!

http://www.edanddebshapiro.com/blogs/

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इस फल को खाने से उतर जाता है चश्मा, दूर हो जाता है गंजापन……………..

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ग्रामीण, आदिवासी और वन अंचलों के नजदीक रहने वाले लोग हमेशा से विभिन्न प्रकार की वन संपदाओं को ही अपना आहार अंग बनाए हुए हैं। एक तरफ हमारे गांव और जंगल हैं, वहीं दूसरी तरफ तथाकथित विकसित समाज है जिसने ज्यादा विकसित होने की दौड़ में अपने लालन-पालन में पोषक तत्वों को कहीं खो दिया है। आदिवासियों का आहार पूर्णत: प्रकृति आधारित होता है और मौसम तथा जलवायु के अनुरूप बदलता भी रहता हैं। कुपोषण आज विश्व की एक बेहद खतरनाक समस्या है, अनेक बच्चों की अकाल मौत का कारण सिर्फ कुपोषण ही है। अमेरिकी संस्थानों में तो भारतीय आदिवासियों के व्यंजनों और आहारों पर निरंतर शोध भी जारी है और वैज्ञानिक इस बात से भी सहमत है कि ये आहार पोषक तत्वों की भरमार लिए हुए हैं। आइए हम भी जाने ऐसे कुछ आहारों को जो हम सभी के बेहतर सेहत के लिए रामबाण साबित हो सकते हैं।
इस फल को खाने से उतर जाता है चश्मा, दूर हो जाता है गंजापन
– कुन्दरू के फल में कैरोटीन प्रचुरता से पाया जाता है जो विटामिन ए का दूत कहलाता है। कुन्दरू में कैरोटीन के अलावा प्रोटीन, फाईबर और कैल्शियम जैसे महत्वपूर्ण तत्व भी पाए जाते है। गुजरात के डांगी आदिवासियों के बीच कुंदरू की सब्जी बड़ी प्रचलित है। इन आदिवासियों के अनुसार इस फल की अधकच्ची सब्जी लगातार कुछ दिनों तक खाने से आंखों से चश्मा तक उतर जाता है साथ ही माना जाता है कि इसकी सब्जी के निरंतर उपभोग से बाल झडऩे का क्रम बंद हो जाता है, गंजेपन से भी बचा जा सकता है।

इस फल को खाने से उतर जाता है चश्मा, दूर हो जाता है गंजापन
–  माना जाता है कि आंखों की बेहतर रौशनी के लिए मुनगे की फलियों को अतिमहत्वपूर्ण माना जाता है। कुछ आदिवासी इसकी पत्तियों को बेसन के साथ मिलाकर पकौड़े भी बनाते है। इन आदिवासियों के अनुसार पेट में कृमि (वर्म) होने की स्थिति में यदि मुनगे की चटनी अथवा पकौड़े खिलाए जाए तो कृमि मृत होकर शौच से बाहर निकल आते हैं।
इस फल को खाने से उतर जाता है चश्मा, दूर हो जाता है गंजापन
– पातालकोट और डरंग दोनों ही आदिवासी क्षेत्रों में टमाटर आहार का सबसे प्रमुख अंग है। प्रतिदिन भोजन के साथ किसी न किसी रूप से टमाटर का उपयोग निश्चित ही होता हैं। टमाटर फाईबर, कार्बोहाइड्रेड्स, पोटेशियम और लौह तत्वों से भरपूर होते हैं। टमाटर में वसा और सोडियम की मात्रा भी कम होती है और इसमें लाईकोपीन नामक प्रचलित एंटीओक्सीडेंट भी पाया जाता हैं।

इस फल को खाने से उतर जाता है चश्मा, दूर हो जाता है गंजापन
– डांग गुजरात में आदिवासी घुईयां या अरबी के पत्तों (200 ग्राम) को उबालते हैं, थोड़ी काली मिर्च डालकर इस उबले रस का सेवन दिन में दो बार करते हैं। पत्तियों को कम तेल में हल्का पकाकर सब्जी के तौर पर भी सेवन किया जाता है, माना जाता है कि हाईपरटेंशन या उच्च रक्तचाप के लिए ये एक बेहतर उपाय है। 

इस फल को खाने से उतर जाता है चश्मा, दूर हो जाता है गंजापन
– कुल्थी और चौलाई जैसी भाजियां रक्त के लाल कणों की संख्या बढ़ाने के साथ ब्लड प्लेटलेट्स (बिम्बाणु) को भी बढ़ाते है यानि आपकी ताकत बढाने और आपको स्वस्थ रखने की ताकत इन भाजियों में समाहित है। इन भाजियों को कम नमक और तेल के साथ कुछ समय के लिए हलका सा गर्म किया जाए और तरकारी के तौर पर खाया जाए तो बेहद फायदेमंद साबित होती हैं।

इस फल को खाने से उतर जाता है चश्मा, दूर हो जाता है गंजापन
– डांग में आदिवासी कोमल बांस की सब्जी बनाते हैं जो कि स्फूर्तिदायक, रक्त शोधक, घाव सुखाने और मूत्रजनित रोगों के लिए उत्तम आहार है।
– पातालकोट में महुआ के फूलों को सुखाकर पाउडर/ आटा तैयार किया जाता है और इससे चपाती बनायी जाती है। वैसे आधुनिक शोधों के परिणामों को देखा जाए तो महुए के सूखे फूल मूत्रजनित रोगो के निवारण के लिए फायदेमंद है और ये टॉनिक की तरह भी कार्य करते हैं। 

इस फल को खाने से उतर जाता है चश्मा, दूर हो जाता है गंजापन
– मध्यप्रदेश के पातालकोट के आदिवासी मुनगा/ सहजन की पत्तियों की चटनी तैयार कर भोजन के साथ बड़े आनंद से खाते हैं साथ ही मुनगे की फलियां भी दाल और सब्जी में डालते हैं। मुनगे की पत्तियों और फलियों में विटामिन ए की प्रचुरता आधुनिक विज्ञान अच्छी तरह से साबित कर चुका है।

– डॉ दीपक आचार्य (डायरेक्टर-अभुमका हर्बल प्रा. लि. अहमदाबाद)

साभार : http://vedichealthtips.blogspot.in/2014/01/blog-post.html

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चिरोटा या चक्रमर्द – फालतू समझकर ना फेंके इसे, ये पौधा आधा दर्जन रोगों की रामबाण दवा है…….

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चिरोटा या चक्रमर्द हिन्दुस्तान के हर प्रांतों में भरपूर देखा जा सकता है। खेत- खलिहानों, मैदानी भागों, सड़क के किनारे और जंगलों में प्रचुरता से पाए जाने वाले इस पौधे में अनेक औषधीय गुणों की भरमार है हालांकि इसे किसी खरपतवार से कम नही माना जाता है। इसका वानस्पतिक नाम केस्सिया टोरा है। चलिए आज जानते हैं चिरोटा से जुड़े हर्बल नुस्खों को और जानें किस तरह से आदिवासी इसे इस्तेमाल करते हैं।
फालतू समझकर ना फेंके इसे, ये पौधा आधा दर्जन रोगों की रामबाण दवा है 
– आदिवासी अंचलों में इसकी पत्तियों का उपयोग भाजी के तौर पर भी होता है और ऐसा माना जाता है कि यह भाजी अत्यधिक पौष्टिक होती है और इसे आदिवासी रसोई में भाजी के तौर पर पकाया और बड़े चाव से खाया जाता है।
– यदि किसी व्यक्ति को दाद-खाज और खुजली की समस्या हो तो चिरोटा के बीजों को पानी में कुचलकर रोग-ग्रस्त अंग पर लगाने से फायदा होता है। आधुनिक विज्ञान भी इसके एंटी-बैक्टिरियल गुणों को साबित कर चुका है।

फालतू समझकर ना फेंके इसे, ये पौधा आधा दर्जन रोगों की रामबाण दवा है 
– पीलिया होने पर डांग गुजरात के हर्बल जानकार चिरोटा की पत्तियों और बीजों का काढ़ा रोगी को देते है। लगभग 50 ग्राम पत्तियों को 2 कप पानी में उबाला जाता है, जब पानी एक कप शेष बचता है तो इसे छानकर रोगियों को दिया जाता है। माना जाता है कि पीलिया जल्द ही ठीक हो जाता है।
फालतू समझकर ना फेंके इसे, ये पौधा आधा दर्जन रोगों की रामबाण दवा है 
– इसकी जड़ों के चूर्ण में थोड़ी सी मात्रा में नींबू का रस मिलाया जाए और दाद-खाज पर लगाया जाए। लेपित करने के बाद इस पर सूती कपड़े की पट्टी लपेट दी जाए। प्रतिदिन ऐसा करने से एक सप्ताह के भीतर ही दाद-खाज की छुट्टी हो जाती है।
– पत्तियों और बीजों को कुचलकर पेस्ट तैयार किया जाए और इस पेस्ट को बवासीर होने पर रोगी के घाव को बाहर से लेपित किया जाए, आराम मिल जाता है।

– पातालकोट के आदिवासी मुर्गी के अंडों से एल्बूमिन (अंडे के अंदर का चिपचिपा तरल पदार्थ) के साथ पत्तियों को अच्छी तरह से फेंट कर टूटी हुयी हड्डियों के ऊपर प्लास्टर की तरह लगाते है, इनका मानना है कि ये हड्डियों को जोडऩे का कार्य करता है।

फालतू समझकर ना फेंके इसे, ये पौधा आधा दर्जन रोगों की रामबाण दवा है 
– पत्तियों के काढे को दांतों पर लगाने और इसी काढे से कुल्ला करने से से दांतों की समस्या जैसे दांत दर्द, मसूड़ों से खून आना आदि शिकायत में आराम मिलता है।
– लगभग 10 ग्राम बीजों को एक कप पानी में उबालकर काढा तैयार कर बच्चों को देने से पेट के कृमि मर जाते हैं और शौच के साथ बाहर निकल आते हैं।

फालतू समझकर ना फेंके इसे, ये पौधा आधा दर्जन रोगों की रामबाण दवा है 
– चिरोटा की पत्तियों और बीजों का उपयोग अनेक रोगों जैसे दाद-खाज, खुजली, कोढ, पेट में मरोड़ और दर्द आदि के निवारण के लिये किया जाता है। आदिवासियों के अनुसार पत्तियों को बारीक पीसकर दाद-खाज, खुजली, घाव आदि पर लगाया जाए तो अतिशीघ्र आराम मिल जाता है।    
साभार : http://vedichealthtips.blogspot.in/search?updated-min=2014-01-01T00:00:00-08:00&updated-max=2015-01-01T00:00:00-08:00&max-results=17
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आधुनिक तकनीक वाले वॉटर प्यूरीफायर से जल की Life Force energy शुन्य हो जाती है…..

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जल रखने के लिए तांबे के बर्तनों का करें उपयोग

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भारतीय परिवार के रसोई में किसी जमाने में तांबे, पीतल, कांसे के बर्तन ही नजर आते थे। स्टील के बर्तन तो आधुनिक समय की देन है। दरअसल हमारी संस्कृति में तांबे, पीतल और कांसे के बर्तनों का इस्तेमाल करने के पीछे अनेक
स्वास्थ्य संबंधी कारण छिपे हुए हैं।

1. भारतीय चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के अनुसार तो नियमित
रूप से तांबे के बर्तन में रखा हुआ पानी पीने से हमारा शरीर चुस्त-दुरूस्त रहता है तथा कब्ज एसिडिटी, अफारा, विविध चर्म-रोग, जोड़ों का दर्द इत्यादि शिकायतों से मुक्ति मिलती है। सवेरे उठकर बिना ब्रश किए हुए एक लीटर
पानी पीना स्वास्थ के लिए हितकर होता है। आयुर्वेद की मानें तो ताम्र-धातु से निर्मित ‘जल-पात्र’ सर्वश्रेष्ठ माना गया है। तांबे के अभाव में मिट्टी का ‘जल-पात्र’ भी हितकर बतलाया गया है।

2. तांबा खाद्य- पदार्थों को जहरीला बनाने वाले विषाणुओं को मारने की क्षमता तो रखता ही है, साथ ही कोशिकाओं की झिल्ली और एंजाइम में हस्तक्षेप करता है, जिससे रोगाणुओं के लिए जीवित रह पाना संभव नहीं हो पाता है.
तांबे के बर्तन में ई-कोली जैसे खतरनाक जीवाणु नहीं पनप सकते। परीक्षणों से यह भी साबित हुआ है कि सामान्य तापमान में तांबा सिर्फ
चार घंटे में ई-कोली जैसे हानिकारक जीवाणुओं को मार
डालता है। इसके विपरीत स्टेनलैस- स्टील के धरातल पर जीवाणु एक महीने से
भी ज्यादा समय तक जिंदा रह सकते है

3. तांबे से शरीर को मिलने वाले लाभ- त्वचा में निखार आता है, कील-मुंहासों की शिकायतें भी दूर होती हैं। पेट में रहनेवाली कृमियों का विनाश होता है और भूख लगने में मदद मिलती है। बढ़ती हुई आयु की वजह से होने वाली रक्तचाप
की बीमारी और रक्त के विकार नष्ट होने में सहायता मिलती है, मुंह फूलना, घमौरियां आना, आंखों की जलन जैसे उष्णता संबंधित विकार कम होते हैं।
एसिडिटी से होने वाला सिरदर्द, चक्कर आना और पेट में जलन जैसी तकलीफें कम होती हैं। बवासीर तथा एनीमिया जैसी बीमारी में लाभदायक । इसके कफनाशक गुण का अनुभव बहुत से लोगों ने लिया है। पीतल के बर्तन में
करीब आठ से दस घंटे पानी रखने से शरीर को तांबे और जस्ते, दोनों धातुओं के लाभ मिलेंगे। जस्ते से शरीर में प्रोटीन की वृद्घि तो होती ही है साथ ही यह बालों से संबंधित बीमारियों को दूर करने में भी लाभदायक होता है

4. बर्मिघम में हुआ शोध शोधकर्ताओं ने अस्पताल में पारंपरिक टॉयलेट
की सीट, दरवाजे के पुश प्लेट, नल के हैंडिलस को बदल कर कॉपर की ऎसेसरीज लगा दीं। जब उन्होंने दूसरे पारम्परिक टॉयलेट में उपस्थित जीवाणुओं के घनत्व की तुलना उससे की तो पाया कि कॉपर की सतह पर 90 से 100 फीयदी जीवाणु कम थे। यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल बर्मिघम में हुए इस शोध में अध्ययन दल के प्रमुख प्रोफेसर टॉम एलिएट ने बताया कि बर्मिघम एवं दक्षिण अफ्रीका में परीक्षणों से पता चला है कि तांबे के इस्तेमाल से अस्पताल के भूतल को काफी हद तक हानिकारक जीवाणुओं से मुक्त रखा जा सकता है। कॉपर बायोसाइड से जुड़े शोधों से भी पता चलता है कि तांबा संक्रमण से दूर रखता है। यही तथ्य ताम्रपात्रों पा भी लागू होते हैं

5. आयुर्वेद में रसरत्नसमुच्चय ग्रंथ के पांचवें अध्याय के श्लोक 46 में कहा गया है कि अंदर तथा बाहर से अच्छी तरह से साफ किए हुए तांबे या पीतल (यह मिश्र धातु 70 प्रतिशत तांबा और 30 प्रतिशत जस्ते का संयुग है) के बर्तनों में करीब आठ से दस घंटे तक रखे पानी में तांबे और जस्ते के गुण संक्रमित होते हैं और यह पानी (ताम्रजल) संपूर्ण शरीर के लिए लाभदायक होता है

6. पानी की अपनी स्मरण-शक्ति होने के कारण हम इस बात पर ध्यान देते हैं कि उसको कैसे बर्तन में रखें। अगर आप पानी को रात भर या कम-से- कम चार घंटे तक तांबे के बर्तन में रखें तो यह तांबे के कुछ गुण अपने में समा लेता है। यह पानी खास तौर पर आपके लीवर के लिए और आम तौर पर आपकी सेहत और शक्ति- स्फूर्ति के लिए उत्तम होता है। अगर पानी बड़ी तेजी के साथ पंप हो कर अनगिनत मोड़ों के चक्कर लगाकर सीसे या प्लास्टिक की पाइप के सहारे आपके घर तक पहुंचता है तो इन सब मोड़ों से रगड़ाते-टकराते गुजरने के कारण उसमें काफी नकारात्मकता समा जाती है। लेकिन पानी में याददाश्त के साथ-साथ अपने मूल रूप में वापस पहुंच पाने की शक्ति भी है।
अगर आप नल के इस पानी को एक घंटे तक बिना हिलाये-डुलाये रख देते हैं
तो नकारात्मकता अपने-आप खत्म हो जाती है|

7. तांबे और चांदी के बैक्टीरिया-नाशक गुण और भी अधिक हो जाते हैं, जब यह धातुएं ’नैनो’ रूप में हों, क्योंकि इस रूप में धातु की सतह को लाखों गुना बढ़ाया जा सकता है। इस वजह से धातु की बहुत कम मात्रा से काम चलाया जा सकता है। ’नैनो-तांबा’ और ’नैनो-चांदी’ पर हुई शोध से यह परिणाम पिछले 10-15 सालों में ही सामने आए हैं और इन्हें वाटर-फिल्टर और एयर-फिल्टर टेक्नालजी में अपनाया जा चुका है। लेकिन विडम्बना यह है कि लोग महंगे-महंगे वाटर-फिल्टर लगवा कर उसका पानी पीना पसंद करते हैं, न कि तांबे के बरतन में रखा पानी। अपने को पढ़ा-लिखा और आधुनिक कहने वाली यह पीढ़ी पुराने तौर-तरीकों को दकियानूसी करार देने में शेखी समझती है, और जब इस पर पश्चिम की मुहर लग जाती है तो उसे सहर्ष गले लगा लेती है।

Pravin Goswami's photo.
पानी को साफ करने के लिए सिरामिक कैंडिल वाला फ़िल्टर ही उपयोग करना सही है ..

फ्रीज, प्लास्टिक बॉटल में जल रखने से या आधुनिक तकनीक वाले वॉटर प्यूरीफायर से उसकी Life Force energy शुन्य हो जाती है. प्यूरीफायर से निकला जल निःसंदेह बैक्टीरिया मुक्त होता है परंतु life force energy शुन्य हो जाती है.

मनुष्य शरीर पांच तत्वों से बना है. जल ऊन में से एक तत्व है.
आजकल पुराने भारतीय तरीके का त्याग कारण है की हमारे शरीर में जल तत्व की कमी हो रही है, जिससे की किडनी और urinary tract संबंधित बीमारियां बढ़ रही है.

समाज में पानी की life force energy शुन्य होने से नपुंसकता भी बढ़ रही है..
कई बार पानी की बोतल कार में रखी रह जाती है. पानी धुप में गर्म होता है.प्लास्टिक की बोतलों में पानी बहुत देर से रखा हो और तापमान अधिक हो जाए तो गर्मी से प्लास्टिक में से डाइऑक्सिन नामक रसायन निकल कर पानी में मिल जाता है. यह कैंसर पैदा करता है.वॉटर प्यूरीफायर भी प्लास्टिक से ही बनते हैं. इसी तरह प्लास्टिक रैप में या प्लास्टिक के बर्तनों में माइक्रोवेव में खाना गर्म करने से भी यह ज़हरीला रसायन बनता है. विशेषकर तब जब खाने में घी या तेल हो. इसी तरह स्टाइरीन फोम के बने ग्लास और दोने भी रसायन छोड़ते है.

साभार : http://vedichealthtips.blogspot.in/2014/01/blog-post_5175.html

जल शोधन के पानी को शुद्ध करने की पारंपरिक विधि / पारंपरिक आदिवासी विधि

 यह सन्देश श्री दीपक आचार्य का अभुमका हर्बल्स, अहमदाबाद, से है. इस सन्देश में दीपकजी हमें बता रहे है की किस प्रकार से पातालकोट, मध्यप्रदेश के आदिवासी पारंपरिक तरीकों से जल का शुद्धिकरण करते है.. पातालकोट घाटी के गाँव की महिलाएँ राजखोह नामक घाटी में स्थित पोखरों से पानी भरती है सामान्यतः गहराई में होने के कारण इन पोखरों का पानी मटमैला होता है. इस पानी में कीचड और अन्य गन्दगियाँ होती है. यहाँ की महिलाएँ इस पानी को शुद्ध करने के लिए निर्गुन्डी नामक वनस्पति की पत्तियों का प्रयोग करतीं  है. पहले घड़े में पानी भर लिया जाता है फिर उसमे लगभग आधे घड़े से थोडा कम जितनी निर्गुन्डी की पत्तियाँ भर दी जाती है. गन्दा पानी पत्तियों के ऊपर फैला होता है. लगभग एक घंटे बाद पानी की सारी गन्दगी घड़े के तल में बैठ जाती है और ऊपर के साफ पानी को निकाल लिया जाता है.. इन आदिवासियों का मानना है की निर्गुन्डी की पत्तियों में मिट्टी और अन्य गन्दगी को आकर्षत करने की क्षमता होती है..जिससे पानी में मौजूद गन्दगी और अन्य सूक्ष्म जीव इन पत्तियों से चिपक जाते है और पानी शुद्ध हो जाता है. आयुर्वेद में भी निर्गुन्डी की पत्तियों और बीजों का जल शुद्धिकरण में प्रयोग के बारे में बताया गया है. इसी प्रकार पातालकोट के हर्राकछार गाँव के आदिवासी नदी के किनारों पर छोटे-छोटे गड्ढ़े खोद कर उसमे नदी का पानी एकत्रित कर उसमे एक कप दही डाल देते है उनका मानना है की दही में भी सूक्ष्म जीवों को अपनी तरफ आकर्षित करने की क्षमता होती है और यह सही भी है की यह सूक्ष्म जीव दही में अपना भोज्य पदार्थ पाते है. कुछ समय बाद गड्ढों के पानी की सारी अशुद्धियाँ तल में बैठ जाती है और पानी पीने योग्य हो जाता है.. दीपक आचार्य का संपर्क है 9824050784
इस Abhumka हर्बल्स, अहमदाबाद से दीपक आचार्य का एक संदेश है. इस संदेश में Deepakji हमें जल शोधन के आदिवासी पारंपरिक विधि बता रहा है. उन्होंने Patalkot घाटी की आदिवासी महिलाओं के Rajkoh घाटी में स्थित पानी तालाबों से पीने भरता कहा. इस तालाब का पानी गंदा है और ठोस अपशिष्ट कणों में शामिल है.आदिवासी महिला के Nirgundi उपयोग कर रहा है Vitex negundo) इस पानी को शुद्ध करने के लिए छोड़ देता है. ऐसा करने के लिए पहली घड़ा Nirgundi को थोड़ा कम पिचर के आधे से अधिक भरा पत्तियां और इसे एक घंटे के लिए छोड़ दिया जाना है तो इस तालाब के पानी से भर जाता है. आदिवासी Nirgundi मिट्टी के कणों और रोगाणुओं को आकर्षित करने के गुण चल रहा है विश्वास रखता है. करीब एक घंटे बाद सभी दोष घड़ा और आदिवासी महिलाओं की तो तैयार सतह पानी पीने और खाना पकाने के प्रयोजन के तल पर नीचे बसे. अन्य विधि में Patalkot के “Harrakacchar” गांव के आदिवासी इस पानी भरे गड्ढे को और सभी दोष गड्ढे और सतह के पानी के तल पर नीचे बसे एक समय के बाद एक प्याला भर दही कहते हैं की तुलना में नदी का पानी इकट्ठा करने के लिए नदी तट पर छोटे गड्ढे dugs इस्तेमाल किया जा सकता है पीने के लिए और साथ ही उद्देश्य खाना पकाने के लिए. दीपक आचार्य का संपर्क 9824050784 है

 

 

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इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

चाय

यह बात कम ही लोग जानते हैं कि चाय का सर्वप्रथम उपयोग एक औषधि के तौर पर किया गया था। जड़ी-बूटियों के जानकार समय-समय पर तमाम रोगों के इलाज के लिए चाय की ताजा पत्तियों और इसके बीजों को औषधि के तौर पर इस्तेमाल करते गए। जैसे-जैसे समय बीता, चाय हमारी जिंदगी का हिस्सा और दिन के शुरुआत में पहले पेय के रूप में हमारे परिवारों के बीच प्रचलित हो गई। खाद्य और पेय पदार्थों को औषधीय गुणों के आधार पर अपने दैनिक जीवन संतुलित मात्रा में लेने से कई रोगों से दूर-दूर तक आपका पाला नहीं पड़ता है। संतुलित मात्रा में चाय का सेवन अनेक रोगों को आपके नजदीक भटकने भी नहीं देता। चलिए आज जानते हैं औषधीय गुणों से भरपूर चाय की चुस्कियों के बारे में……
इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

गौती चाय- बुंदेलखंड में ग्रामीण लोग इस तरह की चाय बनाते हैं। हल्की सी नींबू की सुंगध लिए इस चाय की चुस्की गजब की ताजगी ले आती है। लेमन ग्रास की तीन पत्तियों को हथेली पर कुचलकर दो कप पानी में डाल दिया जाता है और उबाला जाता है। स्वादानुसार शक्कर डालकर इसे तब तक उबाला जाता है जब तक कि यह एक कप बचे। जो लोग अदरक का स्वाद पसंद करते हैं, वे एक चुटकी अदरक कुचलकर इसमें डाल सकते हैं। इस चाय में भी दूध का उपयोग नहीं होता है। गौती चाय में कमाल के एंटीओक्सीडेंट गुण होते हैं, और शरीर के अंदर किसी भी प्रकार के संक्रमण को नियंत्रित करने में गौती चाय काफी असरकारक होती है।
इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

काली चाय- जबरदस्त मिठास लिए ये चाय बगैर दूध की होती है। इस चाय को तैयार करने के लिए 2 कप पानी में एक चम्मच चाय की पत्ती और 3 चम्मच शक्कर को डालकर उबाला जाता है। जब चाय लगभग एक कप शेष रह जाती है, इसे उतारकर छान लिया जाता है और परोसा जाता है। हर्बल जानकारों के अनुसार मीठी चाय दिमाग को शांत करने में काफी सक्रिय भूमिका निभाती है यानि यह तनाव कम करने में मदद करती है।
इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

धनिया चाय- राजस्थान के काफी हिस्सों में धनिया की चाय स्वास्थ्य
सुधार के हिसाब से दी जाती है। लगभग 2 कप पानी में जीरा, धनिया, चायपत्ती और कुछ मात्रा में सौंफ  डालकर करीब 2 मिनिट तक खौलाया जाता है, आवश्यकतानुसार शक्कर और अदरख डाल दिया जाता है। कई बार शक्कर की जगह शहद डालकर इसे और भी स्वादिष्ट बनाया जाता है। गले की समस्याओं, अपचन और गैस से त्रस्त लोगों को इस चाय का सेवन कराया जाता है।

इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

अनंतमूली चाय – पातालकोट में सर्द दिनों में अक्सर आदिवासी अनंतमूली चाय पीते हैं। अनंतमूल स्वभाव से गर्म प्रकृति का पौधा होता है, इसकी जड़ें निकालकर लगभग 1 ग्राम साफ  जड़ पानी में खौलाई जाती है। इसी पानी में थोड़ी सी चाय की पत्तियों को भी डाल दिया जाता है। दमा और सांस की बीमारी से ग्रस्त रोगियों को इसे दिया जाता है।
इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां
 खट्टी गौती चाय- मध्यभारत के गोंडवाना क्षेत्र में गौती चाय बनाते समय इसी चाय में संतरे या नींबू के छिलके डाल दिए जाते हैं और कुछ मात्रा नींबू रस की भी डाल दी जाती है और फि र परोसी जाती है खट्टी गौती चाय। सदियों पुराने इस एंटी एजिंग फार्मुले को आदिवासी अपनाते रहें हैं और अब आधुनिक विज्ञान इस पर ठप्पा लगाना शुरु कर रहा है। नई शोध बताती हंै कि हरी चाय और नींबू का मिश्रण उम्र के पड़ाव की प्रक्रिया को धीमा कर देता है, यानि आप इस चाय का प्रतिदिन सेवन करें तो अपने यौवन को लंबा खींच सकते हैं।
इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

मुलेठी चाय- गुजरात के सौराष्ट्र में जेठीमद चाय के नाम मशहूर इस चाय को मध्यभारत में मुलेठी चाय के नाम से जाना जाता है। साधारण चाय तैयार करते समय चुटकी भर मात्रा मुलेठी की डाल दी जाए तो चाय में एक नई तरह की खुश्बु का संचार होता है और चाय स्वादिष्ठ भी लगती है। दमा और सर्दी खांसी से परेशान लोगों को इस चाय को प्रतिदिन दिन में दो से तीन बार लेना चाहिए।
इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

बस्तर की सैदी या मीठी चाय- शहद होने की वजह से इस चाय को शहदी चाय या सैदी चाय कहा जाता है। बस्तर के दुरस्थ गांवों में अक्सर इस चाय को तैयार किया जाता है। साधारण चाय पत्ती (2 चम्मच) के साथ कुछ मात्रा में शहद (लगभग 2 चम्मच) और दूध (2 चम्मच) डालकर फेंटा जाता है। दूसरी तरफ एक बर्तन में 2 कप पानी को उबाला जाता है। पानी जब उबलने लगे, इसमें इस फेंटे हुए मिश्रण को डाल दिया जाता है। यदि आवश्यकता हो तो थोड़ी सी मात्रा अदरक की डाल दी जाती है और तैयार हो जाती है सैदी चाय। माना जाता है कि यह चाय शरीर में गजब की स्फूर्ति लाती है। शहद, अदरक और चाय के अपने अपने औषधीय गुण है और जब इनका संगम होता है तो ये गजब का टॉनिक बन जाते हैं।
इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

मसाला चाय- गुजरात में काली मिर्च, सौंठ, तुलसी, दालचीनी, छोटी इलायची, बड़ी इलायची, लौंग, पीपलामूल, जायफल, जायपत्री और लौंग मिलाकर एक मसाला तैयार किया जाता है। चाय पत्ती और दूध के उबलते पानी में चुटकी भर मसाला डाल दिया जाता है। स्वादिष्ठ मसाला चाय जब आपको परोसी जाती है, ना सिर्फ ये गजब का स्वाद लिए होती है बल्कि शरीर ताजगी से भरपूर हो जाता है।  
इस तरह बनाकर पिएंगे चाय तो बनी रहेगी जवानी, दूर होंगी ये बीमारियां

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Download “The lesser writings” by Von Boenninghausen

favour and advantage to the homoeopathic profession

E-HOMOEO

  Because a number of physicians desired to obtain certain essays by Boenninghausen and because of the difficulty in obtaining them, Messrs. Boericke & Tafel decided some years since that it would be a favour and advantage to the homoeopathic profession to collect the shorter writings of the old practitioner, many of which had never been before published in English, in book form.

  The result is thus presented. This book includes presumably all the magazine articles by Boenninghausen, and a few of the smaller of the pamphlets written by him.

  The translations were made by Prof. L. H. Tafel especially for this book.

  It has been the pleasure of the editor to collect the articles and in order so to do, all the German and French journals have been examined very carefully.

  These articles have been translated from the original journals, and the phraseology…

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अंधे हाथों में विपश्‍यना के खतरे-(ध्‍यान)

रोज दस घंटे तक विपश्‍यना किसी को भी पागल कर सकती है।

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Your Body Speaks Your Mind: Decoding the Emotional, Psychological, and Spiritual Messages That Underlie Illness

सभी चिकित्सक बंधू के लिए पठनिये

Marshall


Your Body Speaks Your Mind: Decoding the Emotional, Psychological, and Spiritual Messages That Underlie Illness by 5

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Soul Wellness: Day 34 How to Heal Childhood Pain

The Soul Teacher

We finished an amazing Universal Meditation weekend at the Love Peace Harmony Center in Frankfurt, Germany. Many people opened their hearts, made deep spiritual connections with love and the Divine, and a lot of deep healing happened. It was wonderful experience.

I learned more deeply how to help others to be happier and healthier. A common issue that appeared over and over was childhood pain. Many people had great openings and realizations about how their childhood pain is blocking their life. The suffering and pain that we experience as children can create blockages that prevent us from being happy and healthy. Today I would like to share with you a practice to help all those who are suffering from childhood pain.

If we are hurt as a child by someone that we trust and love it can leave a negative memory on our soul, heart, mind and body. The pain…

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वनौषधि

 

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वनौषधि से हमारा तात्पर्य है कि हमारे आस-पास उगने वाले पौधों के वह पत्र,पुष्प,फ़ल,वल्कल एवं जड़ जिसके उचित सेवन से हम शारिरीक व्याधियों को दूर करते हैं। इसे हम स्थानीय बोली में जड़ी बूटी कहते हैं। पौधों के पाँचों अंगो को आयुर्वेद में पंचांग कहा गया है। जब ॠतुओं का संधिकाल होता है तब वातावरण में रोगाणू पनपते है, जन्म लेते हैं। ये रोगाणू मनुष्य से लेकर पशुओं तक के जीवन को प्रभावित कर उसकी कार्यक्षमता को कम कर देते हैं। इन रोगाणुओं से मुक्ति पाने के लिए औषधियों का सेवन करना पड़ता है। औषधियों के अनुभूत नुस्खे हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों में बनाए, जिसका लाभ हम आज भी उठाते हैं। निरोगी रहने के लिए आचार विचार एवं विहार की शुद्धता पर बल दिया गया है। सद व्यवहार कर हम रोग से बच सकते हैं। प्रथमत: कहा गया है कि हित भुक, ॠत भुक एवं मित भुक। हमें पथ्य भोजन का सेवन अपने हित को देख कर करना चाहिए, ॠतु के अनुसार सेवन करना चाहिए, बेरुत के फ़लों, सब्जी या अन्य भोज्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए तथा मितव्ययिता से सेवन करना चाहिए अर्थात भूख से कम ही खाना चाहिए। अधिक खाने से भी उदर रोग के साथ अन्य रोग जन्म लेकर शारिरीक हानि करते हैं।

हम चर्चा कर रहे हैं वनौषधियों की। हमारे आस पास उगने वाले समस्त पौधे और वृक्ष के पंचाग औषधि के रुप में प्रयोग होते हैं। हमारे आस-पास उगने वाले खरपतवार भी औषधिय गुणों के धारक हैं। उनका प्रयोग हम रोग के निदान में कर सकते हैं। पूरे प्रकृति जगत में 4 लाख से भी अधिक पौधे हैं इनमे से एक भी ऐसा नहीं है जो चिकित्सा की दृष्टि से किसी न किसी प्रकार उपयोगी न हो। एक बार ब्रह्मा जी ने जीवक ॠषि को आदेश दिया कि पृथ्वी पर जो भी पत्ता-पौधा-वृक्ष-वनस्पति व्यर्थ दिखे, तोड़ लाओ। 11 वर्ष तक पृथ्वी पर भ्रमण करने के बाद ॠषिवर लौटे और ब्रह्मा जी के समक्ष नतमस्तक होकर बोले – प्रभो! इन ग्यारह वर्षों में  पूरी पृथ्वी पर भटका हूँ प्रत्येक पौधे के गुण-दोष को परखा, पर पृथ्वी पर एक भी पौधा ऐसा नहीं मिला जो किसी न किसी व्याधि के उन्मुलन में सहायक न हो। इस आख्यान से वृक्ष वनस्पतियों की औषधिय गुणवत्ता का भान होता है। अभी तक 4 लाख प्रकार की वनस्पतियों में मनुष्य मात्र 8 हजार के ही गुण जान पाया है। धरती पर जितनी भी औषधियाँ हैं उनमे से अधिकांश की जानकारी भारत ने विश्व को दी है।

पौधों में औषधिय गुण जानने के लिए उनक प्रयोग करना पड़ता है। पशु भी पौधों के औषधिय गुण जानते हैं। बदहजमी होने पर हमने पशुओं को कुछ विशेष प्रकार की घास का सेवन करके वमन करते हुए देखा है। जिससे उनकी बीमारी ठीक होती है। हम वनौषधियों का प्रयोग विभिन्न रुपों में करते हैं। जैसे आसव, अवलेह, भस्म, वटी, रस, चूर्ण, सत्व, अर्क काढा आदि। एक ही औषधि विभिन्न रुपों से प्रयोग में आती है पर उसका प्रयोग भिन्न भिन्न रोगों में होता है।  आयुर्वेद मानता है कि हमारा शरीर कफ़, पित्त, वात नामक तीन मुख्य धातुओं के संतुलन से चलता है। अगर इनमे से कोई एक भी असंतुलित हो जाती है तो हमारा शरीर व्याधिग्रस्त हो जाता है। शरीर में चयापचय के परिणाम स्वरुप विकार उत्तपन्न करने वाले द्रव्य इकत्रित हो जाते हैं। आहार विहार सही नहीं होने से प्रकृति के अनुकूल दिनचर्या नहीं हो पाती, इससे रोगों की बाढ आ जाती है। हमारी प्राचीन चिकित्सा पद्धति रोगों को दबाती नहीं है, वरन उसकी चिकित्सा कर रोग को जड़ से ही खत्म करती है। इसमें समय अवश्य लगता है पर कारगर चिकित्सा होती है।

वनौषधियाँ ईश्वर का दिया सबसे बड़ा वरदान हैं। जिससे शारिरीक एवं मानसिक व्याधियों को शमन होता है। औषधिय गुणों के विषय में हमने प्रारंभिक चर्चा की है। अब हमारे आस पास की कुछ वनौषधियों के विषय में जानते हैं। उनके गुण धर्म क्या हैं और कौन से रोग में उनका प्रयोग कर हम स्वस्थ हो सकते हैं। ज्ञात रहे कि किसी भी वनौषधि का सेवन हम अपने मन से न करके कुशल वैद्य की देख रेख में ही करें अन्यथा इसके दुष्परिणाम हो सकते हैं। वर्तमान में मैने देखा है कि कुछ दवाईयों के नाम जानकर लोग अपनी चिकित्सा घर में करने लग जाते हैं। जिसका दुष्परिणाम किडनी पर पड़ता है। क्योंकि शरीर विजातिय द्रव्यों को किडनी के माध्यम से ही छान कर मुत्र मार्ग से शरीर से बाहर निकालता है। इसलिए चिकित्सा लेते हुए औषधियों के गुण दोषों से सावधान रहने की आवश्यकता है।

हम कुछ वनौषधियों की चर्चा करेगें

1- मुलहठी

मुलैठी, (यष्टिमधु)  इसका काण्ड और मूल मधुर होने के कारण यष्टि मधु कहा जाता है। मधु क्लीतक, जेठीमध तथा लिकोरिस इसके अन्य नाम हैं। इसका बहुवर्षायु झाड़ी लगभग डेढ से दो मीटर ऊंची होती है। जड़ें गोल लम्बी और झुर्रीदार फ़ैली होती हैं। जड़ और काण्ड से कई शाखाएं निकलती हैं। पत्तियां संयुक्त और अण्डाकार होती हैं, जिनके अग्रभाग नुकीले होते हैं। फ़ली छोटी ढाई सेंटीमीटर लम्बी चपटी होती है। जिसमें दो से लेकर पांच वृक्काकार बीज होते हैं।  इस वृक्ष की जड़ को सुखा कर छिलके साथ एवं बिना छिलके के भी प्रयोग में लाया जाता है।

आचार्य सुश्रुत के अनुसार मुलैठी दाहनाशक, पिपासा नाशक होती है।  आचार्य चरक इसे छदिनिग्रहण (एन्टीएमेटिक) मानते हैं। भाव प्रकाश के अनुसार यह वमन नाशक और तृष्णाहर है।  डॉ जियों एन कीव के अनुसार यह तिक्त या अम्लोत्तेजक पदार्थ के खा लेने पर होने वाली पेट की जलन, दर्द आदि को दूर करती है।  युनानी चिकित्सा में मुलैठी का प्रयोग पाचक योगों में किया जाता है। यकृत रोगों में भी यह लाभ कारी है।

ताजा मुलैठी में 50 प्रतिशत जल होता है, जो सुखाने पर मात्र 10 प्रतिशत रह जाता है। इसका प्रधान घटक ग्लिसराईजीन है, जिसके कारण यह मीठी होती है। ग्लिसराईजीन इस पौधे की जड़ों में होता है। आधुनिक वैज्ञानिकों के प्रयोगों ने साबित किया है कि मुलैठी की जड़ का चूर्ण पेट के व्रणों व क्षतों पर (पेप्टिक अल्सर सिन्ड्रोम) कारगर असर डालता है और जल्दी भरने लगे हैं। डी आर लारेंस के अनुसार पेप्टिक अल्सर जल्दी भरने का कारण इसमें मौजुद ग्लाईकोसाईड तत्व है। पेट के अल्सर के भरने के साथ यह मरोड़ के निवारण में मदद करती है।  अब तक पाश्चात्य जगत में मुलैठी के अमाशय एवं आंत्रगत प्रभावों पर 30 रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी हैं। इसके प्रयोग से अमाशय की रस ग्रंथियों से ग्लाईकोप्रोटीन्स नामक रस का स्राव बढ जाता है जो जीव कोषों के जीवनकाल को बढाता है। छोटी मोटी टूट फ़ूट को तुरंत ठीक कर देता है।

खून की उल्टी में 1 से 4 माशा तक तक मुलैठी चूर्ण को  दूध एवं शहद के साथ लिया जा सकता है। हिचकी में मुलैठी का चूर्ण शह्द में मिलाकर नाक में ट्पकाया जाता है और 5 ग्राम खिलाया जाता है। पेट दर्द, प्यास में भी यह तुरंत लाभ देता है।

2- आंवला

संस्कृत में आंवले को आमलकी, आदिफ़ल, अमरफ़ल, धात्रीफ़ल आदि नामों से सम्मानित किया जाता है। कहा जाता है कि इसी का प्रयोग करके चव्यन ॠषि ने पुनर्यौवन को प्राप्त किया था। इस कारण यह चव्यनप्राशअवलेह का मुख्य घटक भी है जो चिरकालीन सर्वपुरातन योग है।  निघण्टु में ग्रंथकार ने सही ही लिखा है।

हरीतकीसमं धात्रीफ़लं किन्तु विशेषत:। रक्त पित्तप्रमेहघ्रं परं वृष्ण रसायनम्॥

आवंला के अधिक कहने की आवश्यकता नही है, इसका प्रभाव सर्वविदित है। आंवला के औषधिय गुणों की प्रशंसा सभी ने की है। चरक के मतानुसार आँवला तीनों दोषों का नाश करने वाला, अग्निदीपक और पाचक है। कामला, अरुचि तथा वमन में विशेष लाभकारी है। यह मेध्य है एवं नाडियों तथा इन्द्रियों का बल बढाने वाला पौष्टिक रसायन है। सुश्रुत के अनुसार पित्तशामक और पिपासा शांत करने वाली औषधियों में अग्रणी माना जाता है। आंवला अम्लपित्त, रक्तपित्त, अजीर्ण एवं अरुचि की एकाकी एवं सफ़लतम औषधि है। डॉ बनर्जी कहते हैं कि आमाशय के अधिक अम्ल उत्पादन करने पर तथा गर्भवती स्त्रियों  के वमन आदि में आंवल सबसे अच्छी और निरापद औषधि है।

आंवले बहुत सारे औषधीय तत्व होते हैं इसमें सबसे अधिक विटामीन सी पाई जाती है, ध्यान देने योग्य है कि आंवला सुखाने पर इसकी गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं आता। इसका सफ़ल प्रयोग स्कर्वी निरोध में किया गया है। स्कर्वी बिटामीन सी से होने वाला रोग है, जिसके कारण शरीर में कहीं से भी रक्त स्राव हो जाता है। मसूड़े सूज जाते हैं, हड्डियाँ अपने आप टूटने लगती हैं। सारे शरीर में कमजोरी और चिड़चिड़ाहट होने लगती है। स्कर्वी रोग को दूर करने की क्षमता की दृष्टि से एक आंवला दो संतरों के समक्ष ठहरता है। प्रतिदिन भोजन में 10 मिली ग्राम विटामीन सी मिलता रहे तो यह रोग नहीं होता। पर रोग की अवस्था में 100 मिली ग्राम प्रतिदिन देना जरुरी होता है। इंद्रीय दुर्बलता, मस्तिष्क दौर्बल्य, बवासीर, हृदय रोग, अन्य रक्त वमन, खाँसी, श्वांस, तथा महिलाओं के प्रमेह रोगों में के साथ क्षय, शरीर शोथ तथा कुष्ठ जैसे चर्म रोगों में वैद्य इसका सफ़लतम प्रयोग करते हैं।

3-हरीतकी (हरड़) हर्रा

हरीतकी को वैद्यों ने चिकित्सा साहित्य में सम्मान देते हुए उसे अमृतोपम औषधि कहा है। राजवल्ल्भ निघण्टु के अनुसार -यस्य माता गृहे नास्ति, तस्य माता हरीतकी। कदाचित कुप्यते माता, नोदरस्था हरीतकी॥ अर्थात हरीतकी मनुष्यों का माता समान हित करने वाली है। माता तो कभी-कभी कुपित भी हो जाती है परन्तु उदर स्थित अर्थात खाई हुई हरड़ कभी अपकारी नहीं होती

आयूर्वेद के ग्रंथकार हरीतकी की इसी प्रकार स्तुति करते हैं और कहते हैं कि – तु हर(महादेव) के भवन में उत्तपन्न हुई है, इसलिए अमृत से भी श्रेष्ठ है।

हरस्य भवने जाता, हरिता च स्वभावत:। हरते सर्वरोगांश्च तस्मात प्रोक्ता हरीतकी॥ अर्थात श्री हर के घर में उत्पन्न होने से हरित वर्ण की होने से, सब रोगों का नाश करने में समर्थ होने से इसे हरीतकी कहते हैं।

हरड़ दो प्रकार की होती है, छोटी और बड़ी। छोटी हरड़ का उपयोग अधिक निरापद माना जाता है। इसे बाल हर्रे भी कहते हैं।

चरक संहिता के अनुसार हरड़ त्रिदोष हर व अनुलोमक है, यह संग्रहणी शूल, अतिसार (डायरिया) बवासीर तथा गुल्म का नाश करती है, एवं पाचन अग्निदीपन में सहायक होती है। किसी हरण को खाने, सुंघने या चूने मात्र से तीव्र रेचन क्रिया होने लगती है। हिमालय व तराई में उत्पन्न होने वाली चेतकी नामक हरड़ इतनी तीव्र है कि इसकी छाया में बैठने मात्र से ही दस्त होने लगते हैं।  यह शास्त्रोक्ति कहाँ तक सत्य है, इसकी परीक्षा शुद्ध चेतकी हरड़ प्राप्त होने पर ही की जा सकती है, परन्तु वृहद आंत्र संस्थान पर इसके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। यह दुर्बल नाड़ियों को सबल बनाती है। कब्ज की राम बाण औषधी है, ड़ेढ से तीन ग्राम हरड़ को सेंधा नमक के साथ दी जा सकती है। बवासीर और खूनी पेचिस में  चरक के अनुसार हरड़ का चूर्ण व गुड़ दोनो गौमुत्र में मिला कर रात्रि भर रखना चाहिए और प्रात: रोगी को पिलाना चाहिए इसे दही मट्ठे के साथ भी दिया जा सकता है। अर्श की सूजन एवं दर्द कम करने के लिए स्थान विशेष पर हरड़ को जल में पीस कर लगाते हैं। इससे रक्त स्राव रुकता है और मस्से सूखते हैं।

वैसे हरड़ कफ़ पित्त वात तीनों के रोगों में काम आती है, सेंधा नमक के साथ कफ़ज, शक्कर के साथ पित्तज एवं घी के साथ वातज रोगों में लाभ पहुंचाती है। व्रणों में लेपन के रुप में, मुंह के छालों में क्वाथ से कुल्ला करके, मस्तिष्क दुर्बलता में चूर्ण के रुप में, रक्त विकार शोथ में उबाल कर, श्वास रोग में चूर्ण, जीर्ण ज्वरों में भी इसका प्रयोग होता है। जीर्ण काया, अवसाद ग्रस्त मन: स्थिति, लंबे समय तक उपवास में, पित्ताधिक्य वाले तथा गर्भवती स्त्रियों के लिए इस औषधि का निषेध है।

4-बिल्व (बेल)

कहा गया है -रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व। रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल के फ़ल को बिल्व कहा गया है। इसके अन्य नाम शाण्डिलरु (पीड़ा निवारक) श्री फ़ल, सदाफ़ल इत्यादि। मज्जा बिल्वकर्कटी कहलाती है और सूखा गुदा बेलगिरी।

आचार्य चरक एवं सुश्रुत दोनो ने ही बेल को उत्तम संग्राही माना है।  फ़ल वात शामक होते हैं। चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिस, दस्तों एवं बवासीर में बहुत लाभकारी मानते हैं। डॉ नादकर्णी ने इसे गेस्ट्रोएण्टेटाईटिस एवं हैजे के एपीडेमेक प्रकोपों में अत्यंत लाभकारी एवं अचूक औषधि माना है। विषाणु के प्रभाव को निरस्त करने की इसमें क्षमता है। पुरानी पेचिस, अल्सरेटिव कोलाईटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है। पका फ़ल हल्का और रेचक होता है। यह रोग निवारक ही नहीं स्वास्थ्यवर्धक भी है। पाश्चात्य जगत में इस औषधि पर काफ़ी काम हुआ है।

आंखों के रोगों में पत्र का स्वरस, उन्माद अनिद्रा में मूल का चूर्ण, हृदय की अनियमितता में फ़ल, शोथ रोगों में पत्र स्वरस का का प्रयोग होता है। श्वांस रोगों में एवं मधुमेह में भी पत्र का स्वरस सफ़लता पूर्वक प्रयोग होता है। सामान्य दुर्बलता के लिए टानिक के समान प्रयोग काफ़ी समय होता आ रहा है। समस्त नाड़ी संस्थान को शक्ति देता है तथा कफ़ वात के प्रकोपों को शांत करता है।

5-अर्जुन (पार्थ)

इसे धवल, ककुभ और नदीसर्ज भी कहते हैं, कहुआ तथा सादड़ी नाम से भी जाना जाता है।  यह सदाहरित वृक्ष है छत्तीसगढ अंचल में काफ़ी पाया जाता है।  इसकी छाल उतार देने पर वह फ़िर आ जाती है और इसकी छाल का ही प्रयोग होता है। एक वृक्ष में छाल तीन साल के चक्र में मिलती है। प्राचीन वैद्यों में वागभट्ट हैं जिन्होने पहली बार इस औषधि के हृदय रोग में उपयोगी होने की विवेचना की है। उसके बाद चक्रदत्त और भाव मिश्र ने इसे हृदयरोगों की अनुभूत औषधि माना। चक्रदत्त कहते हैं कि घी दूध या गुड़ के साथ जो अर्जुन की त्वचा के चूर्ण का नियमित प्रयोग करता है उसे हृदय रोग, जीर्ण ज्वर, रक्त पित्त कभी नहीं सताते, वह चिरंजीवी होता है।

अभी तक अर्जुन से प्राप्त विभिन्न घटकों का प्रभाव जीवों पर देखा गया है। इससे वर्णित गुणों की पुष्टि होती है। अर्जुन से हृदय की मांस पेशियों को बल मिलता है। स्पंदन ठीक एवं सबल होता है तथा उसकी प्रति मिनट गति भी कम हो जाती है। स्ट्रोक वाल्युम और कार्डियक आऊटपुट बढती है। अधिक रक्त स्राव होने पर कोशिकाओं के टूट्ने के खतरे में स्तंभक की भूमिका निभाता है। रक्तवाही नलिकाओं में थक्का नहीं बनने देता तथा बड़ी धमनी से प्रति मिनट भेजे जाने वाले रक्त के आयतन में वृद्धि करता है। इस प्रभाव के कारण यह शरीर व्यापी तथा वायु कोषों में जमे पानी को मूत्र मार्ग से बाहर निकाल देता है।

कफ़ पित्त शामक है, स्थानीय लेप के रुप में बाह्र्य रक्तस्राव  तथा व्रणों में पत्र स्वरस या त्वक चूर्ण प्रयोग करते हैं। खूनी बवासीर में खून बहना रोकता है। वक्षदाह व जीर्ण खांसी में लाभ पहुंचाता है। पेशाब की जलन, श्वेतप्रदर तथा चर्म रोगों में चूर्ण लिए जाने पर लाभकारी। हड्डी टूटने पर छाल का रस दूध के साथ देते हैं। इससे रोगी को आराम मिलता है सूजन व दर्द कम होता है। शीघ्र ही सामान्य स्थिति में आने में मदद मिलती है।

6-पुनर्नवा

पुन: पुनर्नवा भवति। जो फ़िर से प्रतिवर्ष नया हो जाए अथवा शरीरं पुनर्नवं करोति। जो रसायन एवं रक्त वर्धक होने के कारण शरीर को नया बना दे उसे पुनर्नवा कहते हैं। पुनर्नवा  एक सामान्य रुप से पाई जाने वाली घास है। जो सड़कों के किनारे उगी मिल जाती है। इसके फ़ूल सफ़ेद होते हैं। गंध उग्र और स्वाद तीखा होता है, उल्टी लाने वाला गाढा दूध समान द्रव्य इसमें से तोड़ने पर निकलता है। उपरोक्त गुणों द्वारा सही पौधे की पहचान कर ही प्रयुक्त किया जाता है।

आचार्य चरक ने पुनर्नवा पात्र को शरीर शोथ में अति लाभकारी बताया है। धनवंतरि निघन्टुकार ने पुनर्नवा को हृदय रोग, कास, उरक्षत और मुत्रल में भी उपयोगी बताया है। पुनर्नवा से मुत्र का प्रमाण दुगना हो जाता है हृदय संकोचन के साथ धमनियों में रक्त प्रवाह बढने से शोथ दूर होती है। यह हृदय की मांस पेशियों की कार्य क्षमता को बढाता है। इसमें पाए जाने वाला पोटेशियम नाईट्रेट लवण इतना प्रभावी है कि इसकी औषधि की उपयोगिता हृदय रोग में प्रमाणित होती है। एलोपैथी में शोथ उतारने के लिए जो दवाईयां दी जाती हैं उससे पोटेशियम की कमी हो जाती है पर पुनर्नवा मुत्रल होने के साथ पोटेशियम की कमी नहीं होने देता। मधु के साथ पुनर्नवा का प्रयोग अधिक उत्तम माना गया है।

नेत्रों के रोग में स्वरस लाभ कारी अंत: प्रयोगों में अग्निमंदता, वमन, पीलिया रोग, स्त्रियों के रक्त प्रदर में लाभकारी है। पेशाब की जलन, पथरी तथा पेशाब के मार्ग में संक्रमण कारण उत्पन्न होने वाले ज्वर में यह तुरंत लाभ पहुंचाता है।  सभी प्रकार के सर्प विषों का यह एन्टीडोट है। श्वेत पुनर्नवा का ताजा भाग इसी कारण आपात्कालीन उपचार के लिए हमेशा पास रहना चाहिए। यह एक रसायन एवं बल वर्धक टानिक भी है। विशेषकर महिलाओं के लिए सर्वश्रेष्ठ पुष्टिवर्धक माना गया है।

7-ब्राह्मी

यह मुख्यत: जलासन्न भूमि पर पाई जाती है इसलिए इसे जल निम्ब भी कहते हैं। बुद्धि वर्धक होने के कारण इसे ब्राह्मी नाम दिया गय। महर्षि चरक के अनुसार ब्राह्मी मानस रोगों की अचूक एवं गुणकारी औषधि है। अपस्मार रोगों में विशेष लाभ करती है।  सुश्रुत के अनुसार ब्राह्मी का उपयोग मस्तिष्क विकृति, नाड़ी दौर्बल्य, अपस्मार, उन्माद, एवं स्मृति नाश में किया जाना चाहिए। भाव प्रकाश के अनुसार ब्राह्मी मेधावर्धक है। हिस्टीरिया जैसे मनोरोगों में ब्राह्मी तुरंत लाभ करती है तथा सारे लक्षण मिट जाते हैं। पागलपन एवं मिर्गी के दौरे के लिए डॉ नादकर्णी ब्राह्मी पत्तियों का स्वरस घी में उबाल कर दिए जाने पर पूर्ण सफ़लता का दावा करते हैं। जन्मजात तुतलाने वाले व्यक्ति के इलाज में ब्राह्मी सफ़लता पूर्वक कार्य करती है।

यह प्रकृति का श्रेष्ठ वरदान है, किसी न किसी रुप में इसका नियमित सेवन किया जाए तो हमेशा स्फ़ूर्ति से भरी प्रफ़ुल्ल मन: स्तिथि बनाए रखती है।

8-शंखपुष्पी

शंख के समानाकृति वाले श्रेत पुष्प होने के कारण इसे शंखपुष्पी कहते हैं। यह सारे भारत में पथरीली और वन भूमि पर पाई जाती है। यह उत्तेजना शामक प्रभाव रक्तचाप पर भी अनुकूल प्रभाव डालती है। तनाव जन्य उच्च रक्त चाप की स्थिति में शंखपुष्पी अत्यंत लाभकारी है।  आदत डालने वाले ट्रैंक्विलाईजर्स की तुलना में यह अधिक उत्तम है क्योंकि यह तनाव का शमन कर  दुष्प्रभाव रहित निद्रा लाती है।  यह कफ़ वात शामक मानी जाती है। शय्या पर मुत्र करने वाले बच्चों को रात्रि के समय शंखपुष्पी चूर्ण देने से लाभ पहुंचता है। यह दीपक एवं पाचक है, पेट में गए हुए विष को बाहर निकालती है। गर्भाशय की दुर्बलता के कारण जिनको गर्भ धारण नहीं होता या नष्ट हो जाता है उसके उपचार में पुरातन काल से इसका प्रयोग होता आया है। ज्वर और दाह में शांतिदायक पेय के रुप में पेशाब की जलन में डाययुरेटिक की तरह प्रयुक्त होती है। इसे जनरल टानिक के रुप में भी उपयोग में लाया जाता है।

9-निर्गुण्डी

निर्गुडाति शरीर रक्षति रोगेभ्य: तस्माद निर्गुण्डी। अर्थात जो रोगों से शरीर की रक्षा करती है वह निर्गुण्डी कहलाती है। इसे सम्हालू या मेऊड़ी भी कहते हैं। आचार्य चरक इसे विषहर वर्ग की महत्वपूर्ण औषधि मानते हैं। किसी भी प्रकार के बाहरी भीतरी सूजन के लिए इसका उपयोग किया जाता है। यह औषधि वेदना शामक और मज्जा तंतुओं  को शक्ति देने वाली है। वैसे आयुर्वेद में सुजन उतारने वाली और भी कई औषधियों का वर्णन आता है पर निर्गुण्डी इन सब में अग्रणी है और सर्वसुलभ भी।  इसके अतिरिक्त तंतुओं में चोट पहुचने, मोच आदि के कारण आई मांसपेशियों की सूजन में भी यह लाभकारी है। लम्बे समय से चले आ रही जोड़ों के सूजन तथा प्रसव के गर्भाशय की असामान्य सूजन को उतारने में निर्गुंडी पत्र चमत्कारी है। गठिया के दर्द में भी लाभकारी है।  अंड्शोथ में इसके पत्तों को गर्म करके बांधते हैं, कान के दर्द में पत्र स्वरस लाभ दायक है। लीवर की सूजन तथा कृमियों को मारने में भी इसका प्रयोग होता है।

10-शुंठी (सोंठ)

शुष्क होने से इसे शुंठी, अनेक विकारों का शमन करने में समर्थ होने के कारण महौषधि, विश्व भेषज कह जाता है।  कच्चा कंद अदरक नाम से घरेलु औषधि के रुप में सर्वविदित है। आचार्य सुश्रुत ने इसकी महत्ता बताते हुए पिपल्यादि और त्रिकटुगणों में इसकी गणना की है।  यह शरीर के संस्थान में समत्व स्थापित कर जीवन शक्ति और रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाती है। हृदय श्वांस संस्थान से लेकर नाड़ी संस्थान तक यह समस्त अवयवों की विकृति को मिटाकर अव्यवस्था को दूर करती है। शुंठी सायिटिका की सर्वश्रेष्ठ औषधि है, क्योंकि इसकी तासीर गर्म है। पुराने गठिया रोग में यह अत्यंत लाभदायी है। अरुचि, उल्टी होने की इच्छा, अगिन मंदता, अजीर्ण एवं पुराने कब्ज में यह तुरंत लाभ पहुंचाती है। यह हृदयोत्तेजक है जो ब्ल्डप्रेशर सही करती है। खाँसी, श्वांस रोग, हिचकी में भी लाभ देती है। कफ़ निस्सारक है अत: ब्रोंकाईटिस आदि में तो विशेष लाभकारी है। विशेषकर प्रसवोत्तर दुर्बलता से शीघ्र लाभ दिलाती है।

यह एक गर्म औषधि है, अत: इसका प्रयोग कुष्ठ व पीलिया, शरीर में कहीं भी रक्तस्राव होने की स्थिति और गर्मी में नहीं करना चाहिए।

11-नीम (निम्ब)

निम्ब सिन्चति स्वास्थ्यं इति निम्बम अर्थात जो स्वास्थ्य को बढाए, वह नीम कहलाता है।  इसकी महिमा का जितना बखान किया जाए उतना ही कम है। वायु को शुद्ध करने में यह सर्वाधिक योगदान करता है।  चरक एवं सुश्रुत दोनो ने इसे चर्मरोग एवं रक्त शोधन हेतु उत्तम औषधि माना है। निघंटुकार कहते हैं कि नीम तिक्त रस, लघु गुण, शीत वीर्य व क्टु विपाककी होने से कफ़ व पित्त को शांत करता है। कण्डूरोग, कोढ, फ़ोड़े फ़ुंसी, घाव, आदि में लेप द्वारा लाभ करता है। रक्त शोधक होने के कारण यह व्रणों और शोथ रोगों में लाभ पहुंचाता है। मुंह से लिए जाने पर यह पाचन संस्थान में कृमिनाशक, यकृदोत्तेजक प्रभाव डालता है। शोथ मिटाता है तथा श्वांस रोग खाँसी में आराम देता है, मधुमेह, बहुमूत्र रोग में भी इसे प्रयुक्त करते हैं। विषम जीर्ण ज्वरों में इसके प्रयोग का प्रावधान है।

12-सारिवा

इसे अनन्तमूल, गोपव्ल्ली, कपूरी के नाम से भी जाना जाता है। आचार्य सुश्रुत ने सारिवादिगण की प्रधान औषधि इसे ही माना है।  रक्त शुद्धि और धातु परिवर्तन के लिए अनन्तमूल बहुत उपयोगी है। यह औषधि रक्त के उपर अपना सीधा प्रभाव दिखाती है। इसके द्वारा त्वचान्तर्गत रक्त वाहिनियों का विकास होता है जिससे रक्त प्रवाह ठीक गति से होने लगता है।  बाह्र्य प्रयोगों में आंख की लाली आदि संक्रमण रोगों में रस डालते हैं तथा शोथ संस्थानों पर लेप करते हैं। यह अग्निदीपक पाचक है। अरुचि और अतिसार में लाभ पहुंचाती है। खाँसी सहित श्वांस रोगों में यह उपयोगी है, महिलाओं के प्रदर, अनियमित मासिक धर्म आदि रोगों में लाभकारी है।  यह त्रिदोषनाशक तथा किसी भी प्रकार के ज्वार प्रधान रोगों के निवारणार्थ  तथा जीवन शक्ति को बढाने हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है।

13-चिरायता

वनों में पाए जाने वाले तिक्त द्रव्य के रुप में होने के कारण किराततिक्त भी कहते हैं, किरात व चिरेट्ठा इसके अन्य नाम हैं। इसे लगभग सभी विद्वानों ने सन्निपात, ज्वर, व्रण रक्त, दोषों  की सर्वश्रेष्ठ औषधि माना है यह एक प्रकार की प्रति संक्रामक औषधि है जो ज्वर करने वाले मूल कारणों का निवारण करती है। यह कोढ कृमि तथा व्रणों को मिटाता है। संस्थानिक  बाह्य उपयोग के रुप में यह व्रणों को धोने, अग्निमंदता, अजीर्ण, यकृत विकारों में आंतरिक प्रयोगों के रुप में, रक्त विकार, उदर तथा कृमियों के निवार्णार्थ, शोथ एवं ज्वर के बाद दुर्बलता हेतु भी प्रयुक्त होता है। इसे उत्तम सात्मीकरण टानिक भी माना जा सकत है।

14-गिलोय (अमृता)

यह समस्त भारतवर्ष में पायी जाती है, इसे गुडूची, अमृता, मधुपर्णी, तंत्रिका, कुण्डलिनी जैसे नाम दिए हैं आयुर्वेद में इसे ज्वर की महानौषधि मानते हुए जीवन्तिका नाम दिया है।  चरक ने इसे मुख्यत: वात हर माना है। इसे त्रिदोषहर रक्त शोधक, प्रतिसंक्रामक, ज्वरघ्न मानते हैं। विभिन्न अनुपानों के प्रयोग से यह सभी दोषों का शमन कर रक्त का शोधन करती है। यहा पाण्डुरोग तथा जीर्णकास निवारक है। कुष्ठ रोग का निवारण तथा कृमियों को मारने का काम भी करती है। टायफ़ाईड जैसे जीर्ण मौलिक ज्वर में इसका प्रभाव आश्चर्यजनक है। मलेरिया ज्वर में कुनैन से होने वाली विकृतियों को रोकने में सफ़ल है। हृदय की दुर्बलता, रक्त विकार, निम्न रक्तचाप में उपयोग में लाई जाती है। ऐसा कहा जाता है कि यह शुक्राणुओं के बनने की एवं उनके सक्रीय होने की प्रक्रिया को बढाता है। यह औषधि एक समग्र काया कल्प योग है।

15-अशोक

जिस वृक्ष के नीचे बैठने से शोक नहीं होता उसे अशोक कहते हैं अर्थात जो स्त्रियों के समस्त शोकों को दूर भगाता है वह दिव्य औषधि अशोक ही है। इसे हेमपुष्प (स्वर्ण वर्ण के फ़ूलों से लदा) तथा  ताम्रपल्लव नाम से संस्कृत साहित्य में पुकारते हैं। आचार्य सुश्रुत के अनुसार योनि दोषों की यह एक सिद्ध औषधि है। ॠषि कहते हैं कि यदि कोई स्त्री स्नानादि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र पहन कर अशोक की आठ कलियों  का सेवन नित्य करे तो वह मासिक धर्म संबंधी समस्त क्लेशों से मुक्त हो जाती है।  उसके बांझ पन का कष्ट दूर होता है और मातृत्व की इच्छा पूर्ण होती है। अशोक की छाल रक्त प्रदर में, पेशाब रुकने तथा बंद होने वाले रोगों को तुरंत लाभ देती है। अशोक का प्रधान प्रभाव पेट के नीचले भाग – गुर्दों, मुत्राशय एवं योनिमार्ग पर होता है। यह फ़ैलोपिन ट्यूब को सुदृढ बनाती है। जिससे बांझ पन मिटता है। शुक्ल पक्ष में वसंत की छठी को अशोक के फ़ूल दही के साथ खाने से गर्भ स्थापना होती है ऐसा शास्त्रों का अभिमत है। मुत्रघात व पथरी में, पेशाब की जलन में बीजों को शीतल जल में पीस कर मिलाते हैं, पुरुष के सभी प्रकार के मूत्रवाही संस्थान रोगों में अशोक का प्रयोग लाभकारी होता है।

16-गौक्षुर (गोखरु)

वनों मे पाई जाने वाली यह छुरी के समान तेज कांटे वाली औषधि गौआदि पशुओं के पैरों में चुभ कर उन्हे क्षत कर देती है। इसलिए इसे गौक्षुर कहते हैं। इसे श्वदंष्ट्रा, चणद्रुम, स्वादु कंटक एवं गोखरु नाम से भी जाना जाता है। आचार्य चरक इसे मूत्र विरेचन द्रव्यों में प्रधान मानते हुए कहा है – मूत्रकृच्छानिलहराणाम अर्थात यह मूत्र कृच्छ (डिसयुरिया) विसर्जन के समय होने वाले कष्ट में उपयोगी महत्वपूर्ण औषधि है। अश्मरी भेदन में (पथरी को तोड़ना, मूत्र मार्ग से ही बाहर निकालना) हेतू भी इसे उपयोगी माना गया है। इसका सीधा असर मूत्रेन्द्रिय की श्लेष्म त्वचा पर पड़ता है। सुजाक रोग, वस्तिशोथ (पेल्विक इन्फ़्लेमेशन) में भी गोखरु तुरंत अपना प्रभाव दिखाता है।  गर्भाशय को शुद्ध करता है तथा वन्ध्याआत्व को मिटाता है। इस प्रकार से यह प्रजनन अंगों की बलवर्धक औषधि है। इसके अतिरिक्त यह नाड़ी दुर्बलता, नाड़ी विकार, बवासीर, खाँसी तथा श्वांसरोग में लाभकारी है।  यह नपुंसकता निवारण तथा बार बार होएन वाले गर्भपात में भी सफ़लता से प्रयोग होता है।

17-शतावर

इसे शतमली, शतवीर्या, बहुसुताअ भी कहते हैं। वीर्य वृद्धि, शुक्र दुर्बलता, गर्भस्राव, रक्त पदर, स्तन्य क्षय में यह उपयोगी है। स्त्रियों के लिए उत्तम रसायन है स्तन्य वृद्धि तथा दूध की मात्रा बढाने के लिए इसका उपयोग होता है।  स्वप्न दोष के लिए दूध में उबाल कर इसकी जड़ देते हैं। अनिद्रा रोग, शिरोशूल, वात व्याधि, मिर्गी के रोग, मुर्च्छा, हिस्टीरिया की भी यह अचूक औषधि है।

18-अश्वगंधा

इसे असगंध एवं बाराहरकर्णी भी कह्ते हैं, कच्ची जड़ से अश्व जैसी गंध आती है इसलिए इसे अश्वगंधा या वाजिगंधा भी कहते हैं। यह उत्तम वाजिकारक औषधि है इसका सेवन करने से अश्व जैसा उत्साह उत्पन्न होता है। आचार्य चरक ने इसे उत्कृष्ट वल्य माना है, एवं सभी प्रकार के जीर्ण रोगियों, क्षय शोथ अदि के लिए उपयुक्त माना है। शिशिर ॠतु में कोइ वृद्ध इसका एक माह भी सेवन करता है तो वह युवा बन जाता है। इसका मूल चुर्ण दूध या घी के साथ निद्रा लाता है तथा शुक्राणुओं में वृद्धि कर एक प्रकार के कामोत्तेजक की भूमिका निभाता है, परन्तु शरीर पर इसका कोई बुरा प्रभाव नहीं पड़ता। सूखा रोग की यह चिरपरिचित औषधि है।

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