भगवान बुध्द ने प्रतीत्य-समुत्पाद में अनुलोम कि परिभाषा में ‘सनातन’ क्या है —–

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भगवान बुध्द ने क्या खोजा (Invention) ? और सनातन किसे कहते है !

वैदिकब्राम्हणहिन्दुत्वादी ‘सनातन’ शब्द को लेकर बडे अभिमानी है । लेकिन इन्हे या इनके प्रतिष्ठीत धार्मीक आचार्या से कभी पुछता हु कि अंत: ‘सनातन’ क्या है? 100% ‘सनातन’ वादीयों को अश: मात्र भी जानकारी नही है । यह स्थिती वैदिकब्राम्हणहिन्दुत्व कि है। पंरतू ‘सनातन’ को लेकर शेखी बहोत मारते। वास्तविक ‘सनातन’ इस शब्द‍ का वेदिकब्राम्हणहिन्दुत्व से या अन्य किसी धार्मिक रितिरिवाजों से या उनके साहित्य से दुर परे संबंध नही है। यह सब प्राकृतीक (Law of Universal) है।

भगवान बुध्द ने प्रतीत्य-समुत्पाद में अनुलोम कि परिभाषा में ‘सनातन’ क्या है ? उसे समझाया है।
अनुलोम –
1) अविद्या के प्रत्यय (कारण) से संस्कार उत्पन्न होते है ।
2) संस्कार के प्रत्य‍य से विज्ञान (चेतना) उत्पन्न‍ होते है।
3) विज्ञान के प्रत्यय से नाम-रूप (मन और शरिर) उत्पन्न होते है।
4) ‘नाम-रूप’ के प्रत्‍यय से छ:-आयतन (छ:-इंद्रिया) उत्पन्न होते है।
5) छ:-आयतन के प्रत्‍यय से स्‍पर्श (बाहर के विषय इंद्रियों को स्पर्श करना) उत्पन्न होते है।
6) स्‍पर्श के प्रत्‍यय से वेदना उत्पन्न होती है।
7) वेदना के प्रत्यय से तृष्णा‍ उत्पन्न होती है।
8) तृष्णा के प्रत्यय से उपादान उत्पन्न होता है।
9) उपादान के प्रत्यय से भव उत्‍पन्‍न होता है।
10) भव के प्रत्यय से जाति (जन्म‍) होता है।
11) जाति (जन्म‍) के प्रत्यय से दुख: उत्प‍न्न होता है।
12) दुख: जैसे जन्म‍, बुढापा, मरना, शोक, रोना, पीटना, बैचैन, परेशान होना इस प्रकार के यह सभी दुख: है।

मानवजिवन धरती पर था और जबतकर रहेंगा तबतक अविद्या से दुख होंगा ही, यह था और है एंव रहेंगा अर्थात दुखचक्र सनातन है। इस प्रकार के 12 दुखचक्र कि धारा ही ‘सनातन’ है। अगर आप उपर कि ‘तृष्‍णा’ पर नियंत्रन करना सिख लेते है तो क्या होंगा ?

भगवान बुध्द प्रतिलोम में तृष्णा पर नियंत्रन करने से क्या होंगा ? यह समझाते है।

1) अविद्या के संपुर्णता रूक जाने से संस्कार रूक जाते है।
2) संस्कार रूक जाने से विज्ञान रूक जाता है।
3) विज्ञान रूक जाने से नाम-रूप रूक जाता है।
4) नाम-रूप रूक जाने से छ:-आयतन रूक जाते है।
5) छ:-आयतन के रूक जाने से स्‍पर्श रूक जाता है।
6) स्‍पर्श रूक जान से वेदना रूक जाती है।
7) वेदना के रूक जाने से तृष्णा रूक जाती है।
8) तृष्णा के रूक जाने से उपादान रूक जाता है।
9) उपादान के रूक जाने से भव रूक जाता है।
10) भव के रूक जाने से जन्‍म होना रूक जाता है।
11) जन्म रूक जाने से दुख: रूक जाता है।
12) दुख रूक जाने से बुढापा, मरना, शोक, रोना, पीटना, बैचैन, परेशान होना यह सब रूक जाते है।

अर्थात उप्‍पर के 12 अनुलोम सनातन ‘दुख:चक्र’ है! और निचे के 12 प्रकारके प्रतिलोम कि खोज भगवान बुध्द कि थी जिसे कहा जाता है दुख:मुक्ति का ‘धम्मचक्र प्रर्वतन’। और धम्मचक्र यह दुखचक्र पर उपाय है’। दुख:चक्र सनातन ही रहेंगा यह किसी परम्परा से संबधीत नही है यह यूनिवर्सल कानुन है यह कुदरत का कानुन है। इस ‘दुखचक्र’ से मुक्ति के मार्ग को खोजने के लिये अनगिनत कल्पों तक बोधिस्तव अपनी पारमीताओं को पूरा करते है और स्वयम दुखों: से मुक्त होते है तब वह कहलाते है ‘सम्यक-सम्बुध्द’ इस खोज पर अधिपत्य मात्र ‘श्रमण संस्कृती के ‘श्रमणों’ का ही है। वैदिकब्राम्हणहिन्दु’त्व या अन्‍य परम्‍परा में दुखमुक्ति का मार्ग नही खोज सकते, यह निसर्ग का नियम है।

source : https://www.facebook.com/photo.php?fbid=599195930189783&set=a.114482368661144.18787.100002981450519&type=1&theater

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About Swami Devaishta

I am a osho sanyasi, yoga teacher and a homoeopath.
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