आदतें — क्या सिगरेट पीना पाप है ?

स्मोकिंग

मैं लगातार रूप से सिगरेट पीने की आदत नहीं छोड़ सकता। मैंने बहुत कोशिश की पर असफल रहा। क्या सिगरेट पीना पाप है? राई का पर्वत मत बनाओ! धार्मिक व्यक्ति ऐसा करने में बहुत कुशल है। वास्तव में तुम क्या कर रहे हो जब तुम सिगरेट पीते हो? बस थोड़ा-सा धुआं अपने फेफड़ों में ले रहे हो और बाहर निकाल रहे हो। यह एक प्रकार का प्राणायाम है … गंदा, खराब, लेकिन है तो प्राणायाम ही! तुम योग कर रहे हो, बेवकूफी भरा। यह पाप नहीं है। यह बेवकूफी हो सकता है लेकिन यह पाप अवश्य ही नहीं है। केवल एक ही पाप है और वह है बेहोशी, केवल एक ही पुण्य है होश, जागरूकता। जो भी तुम कर रहे हो करो, लेकिन इसके साक्षी बनो, और तत्क्षण तुम्हारे करने की गुणवत्ता बदल जाती है। मैं तुम्हें सिगरेट ना पीने के लिए नहीं कहूंगा; वह तुमने करके देख लिया। तुम्हें कई तथाकथित संतों ने सिगरेट पीने से मना किया होगा: क्योंकि अगर तुम सिगरेट पिओगे तो नर्क में गिरोगे। ईश्वर तुम्हारे संतों की तरह मूर्ख नहीं है। किसी को नर्क में डालना केवल इसलिए की वह सिगरेट पीता है एकदम अनुचित है। एक सुबह वीनट्राउब एक रेस्टोरेन्ट में गया और सूअर के गोश्त और अंडों का आर्डर दिया। वह एक रूढ़िवादी यहूदी था और उसकी पत्नी घर में सख्ती से यहूदी खानपान का पालन करनेवाली थी, पर इस बार वीनट्राउब को इसकी इच्छा हुई। जैसे ही वीनट्राउब रेस्टोरेन्ट से निकलने को था, वह भय से स्तब्ध होकर द्वार पर ही रुक गया। आसमान काले बादलों से भरा हुआ था, बिजली कडक रही थी, और धरती गड़गड़ाहट के साथ कांपने लगी। क्या तुम सोच सकते हो! उसने चिल्ला कर कहा। जरा से सूअर के गोश्त के टुकड़े पर इतना उपद्रव? लेकिन कई युगों से, सदियों से तुम्हारे तथाकथित संत यही समझा रहे हैं।. सिगरेट पीना अस्वास्थ्यकर है, खराब है, लेकिन पाप नहीं है। यह पाप है अगर तुम इसे बेहोशी से कर रहे हो। सिगरेट पीना इसे पाप नहीं बनाता बल्कि बेहोशी इसे पाप बनाती है। मुझे इस तथ्य पर जोर देने दो। तुम अपनी प्रार्थना रोज बेहोशी में कर सकते हो; तब तुम्हारी प्रार्थना पाप है। तुम अपनी प्रार्थना को एक लत बना सकते हो। अगर तुम एक दिन प्रार्थना ना करो, पूरे दिन तुम्हें कुछ बुरा अनुभव होगा, कुछ खो गया है…कुछ खालीपन। ऐसा ही है सिगरेट पीना या शराब पीना; इनमें कुछ फर्क नहीं है। तुम्हारी प्रार्थना एक यांत्रिक आदत बन गई है; यह तुम्हारी मालिक हो गयी है। यह तुम्हारे ऊपर मालकियत करती है; तुम बस एक नौकर हो, इसके एक गुलाम। यदि तुम इसे नहीं करते तो, यह तुम्हें इसे करने के लिये बाध्य करती है। तो सवाल सिगरेट पीने का नहीं है। तुम अपना भावातीत ध्यान प्रतिदिन नियमित रूप से कर सकते हो, और वह एक जैसा हो सकता है। अगर उसमें बेहोशी की अवस्था है, अगर यांत्रिकता है, अगर यह एक निश्चित दिनचर्या बन गया है, अगर यह एक आदत बन गई है और तुम आदत के शिकार हो और तुम इसे अलग नहीं कर सकते हैं, तुम अपने मालिक नहीं हो, तब यह पाप है। लेकिन इसका पाप होना तुम्हारी बेहोशी से आता है, ना कि इस कृत्य से। कोई कृत्य पुण्य नहीं है, कोई कृत्य पाप नहीं है। सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि कृत्य के पीछे कैसी चेतना है। तुम कहते हो: मैं सिगरेट पीने की आदत नहीं छोड़ सकता। तुम्हारी सिगरेट पीने की आदत में मेरी ज्यादा रुचि नहीं है: मेरी ज्यादा रुचि तुम्हारी आदत में है। कोई भी आदत जो एक ताकत बन जाती है, तुम्हें दबानेवाली ताकत, पाप है। व्यक्ति को चाहिए कि वह स्वतंत्र रहे। आदत के अनुसार नहीं बल्कि स्थिति के अनुसार काम करना चाहिए। जीवन प्रतिपल बदल रहा है, यह एक प्रवाह है और आदतें स्थिर हैं। जितना अधिक तुम आदतों से घिरे हो, उतना ही तुम जीवन के प्रति बन्द हो जाते हो। तुम खुले नहीं हो, तुम्हारे अंदर खिड़कियां नहीं हैं। तुम्हारा जीवन से कोई संवाद नहीं है; तुम अपनी आदतों को दोहराए चले जाते हो। उनका मेल नहीं है। वे स्थिति के अनुसार, उस क्षण में उपयुक्त नहीं हैं। वे हमेशा पीछे रहती हैं, वे हमेशा अधूरी पड़ती हैं। यही तुम्हारे जीवन की हार है। स्मरण रहे: मैं हर तरह की आदत के खिलाफ़ हूं। अच्छी और बुरी आदत का सवाल नहीं है। अच्छी आदत जैसा कुछ नहीं है, बुरी आदत जैसा कुछ नहीं है। सब आदतें बुरी हैं क्योंकि आदत का मतलब है कि कुछ बेहोशी तुम्हारे जीवन पर हावी हो गयी है, निर्णायक बन गई है। अब तुम निर्णायक नहीं हो। जागरूकता से जवाब नहीं आ रहा है बल्कि एक ढांचे, नक्शे से जिसे तुमने अतीत से सीखा है। मैंने कई अमीर लोगों को बहुत गरीबी का जीवन जीते देखा है। इससे पहले कि वे अमीर बने उनकी आदतें पक्की हो गयीं, और उनकी आदतें तब पक्की हो गईं जब वे गरीब थे। इसीलिए तुम अमीरों में इतनी कृपणता पाते हो; यह उन आदतों से आती है, जो उन में गरीबी के समय समा गई थी। दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में से एक — नहीं, अमीर आदमियों में से एक नहीं, बल्कि दुनिया का सबसे अमीर आदमी, हैदराबाद के निज़ाम को माना जाता था। उसका हीरों का संग्रह दुनिया में सबसे बड़ा था क्योंकि वह गोलकुंडा की हीरों की खदान का मालिक था, जिसने दुनिया को सबसे ज्यादा बड़े हीरे उपलब्ध कराये। कोहिनूर गोलकुंडा से आया था। यह कभी निज़ाम के पास था। उसके पास इतने हीरे थे कि यह कहा जाता था कि उनकी कीमत का कोई भी कभी सही अंदाज़ा नहीं लगा सका। हजारों की संख्या में हीरे ही हीरे! उन्हें गिना नहीं, तोला जाता था। लेकिन वह दुनिया के सबसे कृपण आदमियों में से था। उसने एक टोपी तीस साल तक पहनी। उससे बदबू आती थी लेकिन वह उसे बदलता नहीं था। वह एक ही कोट को जीवन भर पहनता रहा और वह उसको धोने के लिये नहीं देता था क्योंकि वह खराब हो जाएगा। वह इतना कृपण था कि तुम कल्पना भी नहीं कर सकते कि वह मेहमानों की एशट्रे से आधी पी हुयी सिगरेट के टुकड़े इक्कठा कर लेता था। दुनिया का सबसे अमीर आदमी दूसरों की पी हुई सिगरेट पीता! मेहमान के जाते ही वह पहली चीज यही करत था कि एशट्रे में से सिगरेट के टुकड़े इक्कठा करना। जब वह मरा तो उसका सबसे बड़ा हीरा उसके गंदे जूतों में मिला। उसने उसे अपने जूतों में छिपाया हुआ था! हो सकता है उसने कुछ सोच रखा हो कि शायद वह उसे अपने साथ दूसरी दुनिया में ले जाएगा। हो सकता है वह डरा हुआ था कि: जब मैं मर जाऊंगा, लोग इसे चुरा लेंगे।वह सबसे बड़ा हीरा था। यहां तक कि जब कोई मरने को होता है वह पुरानी आदतों में जीता है, पुराने तरीकों को अपनाए रहता है। बूढ़ा मुल्ला नसरुद्दीन बहुत अमीर हो गया था। जब उसे लगा कि मृत्यु निकट है, उसने अपने अंतिम संस्कार के लिये कुछ इंतजाम करने की सोची, उसने एक आबनूस की लकड़ी से बने सुंदर ताबूत का आर्डर दिया जिसके अन्दर साटन के तकिए हों। उसके पास अपने मृत शरीर को पहनाने के लिए एक सिल्क का सुंदर कफ़्तान भी था। जिस दिन दर्जी ने कफ़्तान बना कर दिया, मुल्ला नसरुद्दीन ने इसे पहन कर देखा कि यह कैसा लगता है, लेकिन अचानक वह चिल्लाया, यह क्या! जेब कहां हैं? सिगरेट पीना या ना पीना, यह महत्वपूर्ण नहीं है। अगर तुम सिगरेट पीना जारी रखते हो तो हो सकता है तुम थोड़ा जल्दी मर जाओ। तो क्या? दुनिया में बहुत ज्यादा जनसंख्या है, तुम जरा जल्दी मर कर कुछ अच्छा ही करोगे। या तुम्हें क्षयरोग हो जाएगा। तो क्या? क्षयरोग आजकल आम सर्दी की तरह है। वास्तव में आम सर्दी का कोई इलाज नहीं है लेकिन क्षयरोग का इलाज है। मुझे पता है क्योंकि मैं आम सर्दी से पीड़ित रहता हूं। क्षयरोग होना बहुत भाग्य की बात है। यह संभव है कि तुम दो साल पहले मर जाओ, तुम्हें क्षयरोग हो जाए लेकिन यह पाप नहीं है। इसके बारे में चिंता मर करो। अगर तुम वास्तव में अपनी ज़िंदगी के बारे में कुछ करना चाहते हो, सिगरेट छोड़ने से कोई मदद नहीं मिलेगी क्योंकि मैं उन लोगों को जानता हूं जिन्होंने सिगरेट छोड़ी; वे चुइंगम खाना शुरु कर देते हैं। वही पुरानी बेवकूफी! और अगर वे भारतीय हैं तो वे पान खाना शुरु कर देते हैं, बात वही है। तुम कुछ ना कुछ करोगे। तुम्हारी बेहोशी कोई काम चाहेगी, कुछ व्यस्तता। यह एक व्यस्तता है। और यह केवल एक लक्षण है; यह वास्तव में समस्या नहीं है। यह समस्या की जड़ नहीं है। क्या तुमने निरीक्षण नहीं किया? जब भी तुम भावनात्मक रूप से परेशान होते हो तुम तुरन्त सिगरेट पीना शुरु कर देते हो। यह तुम्हें एक तरह की राहत देता है; तुम व्यस्त हो जाते हो। तुम्हारा मन भावनात्मक रूप से विचलित है। जब भी लोग तनाव में होते हैं, वे सिगरेट पीना शुरु कर देते हैं। तनाव समस्या है, समस्या भावनात्मक परेशानी है, समस्या कहीं और है; सिगरेट पीना बस एक व्यस्तता है। तुम धुआं अन्दर लेने और बाहर छोड़ने में व्यस्त हो जाते हो और तुम कुछ समय के लिये भूल जाते हो…क्योंकि मन दो चीजों को एक साथ नहीं सोच सकता, याद रखो। मन की एक बुनियादी बात यह है कि वह एक बार में एक चीज ही के बारे में सोच सकता है; यह एक-आयामी है। अगर तुम सिगरेट पी रहे हो और और इसी के बारे में सोच रहे हो, तो तुम और चिन्ताओं से अलग हो जाते हो। यही सारा रहस्य है तथाकथित धार्मिक मत्रों का: वे कुछ नहीं बस विक्षेप हैं, सिगरेट पीने की तरह। तुम दोहराते हो ओम, ओम, ओम, या राम, राम, राम, या अल्लाह, अल्लाह, अल्लाह, यह केवल मन को एक व्यस्तता दे रहा है। और ये सब लोग जो मंत्र सिखाते हैं, कहते हैं इसको जितना जल्दी हो सके दोहराओ, ताकि दो शब्दों के बीच में छोटा सा भी अन्तराल ना हो। उन्हें एक दूसरे के ऊपर चढ़ने दो, तो “राम, राम, राम”– दो राम के बीच में अन्तराल ना हो, नहीं तो कोई विचार घुस जाएगा। इसे पागलों की तरह दोहराओ। हां, यह तुम्हें एक तरह की राहत देगा, वैसी ही राहत जैसी सिगरेट पीने से मिलती है, क्योंकि तुम्हारा मन दुनिया की चिंताओं से हट जाएगा। तुम दुनिया के बारे में भूल जाओगे; तुमने एक छल पैदा किया। सब मंत्र छ्लावे हैं, लेकिन वे धार्मिक हैं। लगातार सिगरेट पीना भी एक मंत्र है। यह एक सांसारिक मंत्र है, इसे तुम गैर-धार्मिक कह सकते हो, धर्मनिरपेक्ष। असली समस्या है, आदत । तुम कहते हो: मैंने इसे छोड़ने की बहुत कोशिश की… तुमने इसके प्रति जागरूक होने की कोशिश नहीं की, बिना जागरुक हुए तुमने इसे छोड़ना चाहा। यह संभव नहीं है। यह फिर वापिस आ जाएगी, क्योंकि तुम्हारा मन वही का वही है; इसकी आवश्यकताएं वही हैं, इसकी समस्याएं वही हैं, इसकी चिंताएं, तनाव वही हैं। और जब वह चिंताएं उठती हैं, तुम क्या करोगे? तुरंत, यांत्रिक रूप से, तुम सिगरेट की तलाश करने लगोगे। तुमने भले ही बार-बार निश्चय किया हो, और बार-बार तुम असफल हुए, इसलिए नहीं कि सिगरेट पीना कोई बहुत बड़ी बात है, कि तुम इससे निकल नहीं सकते, बल्कि इसलिए क्योंकि तुम गलत छोर से प्रयास कर रहे हो। बजाए सारी स्थिति के प्रति जागने के कि तुम सिगरेट पीते ही क्यों हो, बजाए सिगरेट पीने कि प्रक्रिया के प्रति जागने के, तुम बस इसे छोड़ना चाहते हो। यह पेड़ की जड़ काटे बिना उसकी पत्तियां छांटने जैसा है। और यहां मेरा सारा प्रयास जड़ को काटने का है, ना कि पत्तियां छांटने जैसा। पत्तियां और शाखाएं छांटने से पेड़ और मोटा हो जाएगा, पत्तियों के गुच्छे और भर जाएंगे। तुम पेड़ को नष्ट ना कर सकोगे; वास्तव में तुम इसे और सहारा दोगे। अगर तुम वास्तव में इससे बाहर आना चाहते हो तो तुम्हें गहरे में देखना होगा, लक्षणों में नहीं लेकिन जड़ों में। जड़ें कहां हैं? तुम जरूर एक बहुत ही चिंता से भरे व्यक्ति हो, अन्यथा लगातार रूप से सिगरेट पीना संभव नहीं है; सिगरेट पीना छाया की तरह है। तुम जरूर अपने अन्दर हजारों बाधाओं को लेकर बहुत चिंतित हो, तुम अवश्य ही अपने हृदय में अपनी छाती पर चिंताओं का भारी बोझ लिए हो, कि तुम नहीं जानते उन्हें कैसे भूला जाए। तुम नहीं जानते कि उन्हें कैसे छोड़ा जाए; सिगरेट पीना कम से कम उन्हें भूलने में तुम्हारी मदद करता है। तुम कहते हो: मैंने बहुत कोशिश की…। अब एक चीज समझने जैसी है। सम्मोहनविदों ने एक बुनियादी नियम खोजा है, वे इसे विपरीत प्रभाव का नियम कहते हैं। यदि तुम बिना बुनियादी बातों को समझे कुछ करने का कठोर प्रयास करो, तो विपरीत परिणाम होगा। यह ठीक वैसे ही है जैसे कि तुम साइकिल चलाना सीखते हो। तुम एक खाली सड़क पर हो, कोई ट्रैफिक नहीं है, सुबह का समय है, और तुम्हें एक लाल मील का पत्थर सड़क के किनारे हनुमान के समान खड़ा दिखाई पड़ता है। एक साठ फीट चौड़ी सड़क और एक छोटा सा मील का पत्थर, और तुम डर जाते हो: तुम मील के पत्थर की तरफ़ चले जाते हो, तुम मील के पत्थर को टक्कर मार सकते हो। अब तुम साठ फीट चौड़ी सड़क को भूल जाते हो। वास्तव में, अगर तुम आंखों पर पट्टी बांध कर जाओ तब भी ज्यादा संभावना नहीं है कि तुम मील के पत्थर से टकराओगे, पर खुली आंखों से अब सारी सड़क भूल गयी है; तुम केंद्रित हो गये हो। पहले तो वह लालपन बहुत आकर्षित करने वाला है। और तुम इतने डरे हुए हो, तुम इससे बचना चाहते हो। तुम भूल जाते हो कि तुम एक साइकिल पर हो; तुम सब कुछ भूल गये हो। अब तुम्हारी सारी समस्या है कि कैसे इस पत्थर से बचा जाए; अन्यथा तुम अपने को चोट पहुंचा सकते हो, तुम इससे टकरा सकते हो। अब टक्कर बिल्कुल सुनिश्चित है; तुम पत्थर से टकराने को बाध्य हो। और तब तुम आश्चर्य करोगे: मैंने बहुत कोशिश की। यह तुम्हारी बहुत कोशिश ही तुम्हें पत्थर के पास ले गयी। और जितना तुम पास आते हो, उतना ही तुम इससे बचने की कोशिश करते हो, लेकिन जितना ज्यादा तुम इससे बचने की कोशिश करते हो, उतना ही तुम्हारा ध्यान इस पर केंद्रित हो जाता है। यह एक सम्मोहक शक्ति बन जाती है, यह तुम्हें सम्मोहित कर लेता है। यह एक चुम्बक बन जाता है। यह जीवन का एक बुनियादी नियम है। लोग कई चीजों से बचना चाहते हैं और वे उन्हीं चीजों से ग्रसित हो जाते हैं। किसी भी चीज से बचने का बहुत प्रयास करो और तुम्हारा उस गड्ढे में गिरना सुनिश्चित है। तुम इससे बच नहीं सकते, यह इससे बचने का तरीका नहीं है। विश्रांत रहो। बहुत कोशिश मत करो, क्योंकि विश्रांति से तुम जागरुक बन सकते हो, ना कि बहुत कोशिश करने से। विश्रांत, शांत, मौन बनो। मेरी सलाह है: जितना हो सके उतनी सिगरेट पिओ। पहली तो बात कि यह पाप नहीं है। मैं तुम्हें आश्वासन देता हूं। मैं जिम्मेदार रहूंगा। मैं पाप अपने ऊपर लेता हूं, अगर तुम्हें निर्णय के दिन भगवान मिलें तो कहना यह आदमी जिम्मेवार है। और मैं वहां गवाह के रुप में खड़ा रहूंगा कि तुम जिम्मेवार नहीं हो। तो यह चिंता मत करो कि वह पाप है। विश्रांत रहो और इसे प्रयत्न पूर्वक छोड़ने की कोशिश मत करो। नहीं, यह मदद नहीं करेगा। ज़ेन प्रयासरहित समझ में विश्वास करता है। मेरी तो यह सलाह है: जितना चाहो उतनी सिगरेट पिओ, बस इसे ध्यानपूर्वक पिओ। अगर ज़ेन को मानने वाले लोग चाय ध्यानपूर्वक पी सकते हैं,तो तुम सिगरेट ध्यानपूर्वक क्यों नहीं पी सकते? वास्तव में, चाय में वही उत्तेजक तत्व होते हैं जो सिगरेट में; ये वही उत्तेजक तत्व हैं, ज्यादा फ़र्क नहीं है। ध्यानपूर्वक सिगरेट पिओ, बहुत धार्मिक भाव से। इसे एक उत्सव बनाओ। इसे मेरे तरीके से करो। सिगरेट पीने के लिए अपने घर में एक छोटा सा कोना बनाओ:एक छोटा समर्पित मंदिर, सिगरेट वाले देवता को समर्पित। सबसे पहले अपने सिगरेट के पैकेट की ओर झुको। थोड़ी बातचीत करो, सिगरेट से बातें करो। पूछो, आप कैसी हैं? और तब बहुत धीरे से एक सिगरेट बाहर निकालो, बहुत धीरे से, जितना हो सके इतना धीरे, क्योंकि अगर तुम इसे बहुत धीरे करोगे तो तुम जागरूक रहोगे। इसको एक यांत्रिक तरीके से मत करो, जैसा कि तुम अक्सर करते हो। और तब सिगरेट को पैकेट पर जब तक तुम चाहो बहुत धीर-धीरे ठोंको। कोई भी जल्दी नहीं है। तब लाइटर निकालो, लाइटर को प्रणाम करो। ये सब महान देवी, देवता हैं! लाइट, ईश्वर है, तब भला लाइटर क्यों नहीं? फिर बहुत धीरे-धीरे सिगरेट पीना शुरु करो, जैसे विपस्सना करते हो। इसको प्राणायाम की तरह जल्दी से, तेजी में, गहराई से मत करो, पर बहुत धीरे-धीरे। बुद्ध कहते हैं: स्वाभाविक स्वांस लो। इसलिए तुम स्वाभाविकता से सिगरेट पिओ: बहुत धीरे, जल्दबाजी नहीं। यदि यह एक पाप है तो तुम जल्दी में होते हो। यदि यह पाप है तो तुम इसे जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी समाप्त करना चाहते हो। यदि यह पाप है तो तुम इसकी ओर देखना नहीं चाहते। तुम अखबार पढ़ते रहते हो और सिगरेट पीते रहते हो। पाप की ओर कौन देखना चाहता है? लेकिन यह पाप नहीं है, इसलिए इसे देखो, अपने प्रत्येक कृत्य को देखो। अपने कृत्यों को छोटे टुकड़ों में विभाजित करो जिससे तुम इसे बहुत धीरे कर सको। और तुम आश्चर्यचकित हो जाओगे: अपना सिगरेट पीना देखने से, धीरे-धीरे सिगरेट पीना कम हो जाएगा। और एक दिन अचानक…यह गया! तुमने इसे छोड़ने का कोई प्रयास नहीं किया: यह अपने आप छूट गया, क्योंकि एक मृत आदत, एक नियमितता, एक यांत्रिक आदत के प्रति जागने से तुमने अपने में जागरुकता की एक नई ऊर्जा पैदा की, ऊर्जा को मुक्त किया। केवल वह ऊर्जा तुम्हारी मदद कर सकती है; और कुछ भी कभी भी मदद नहीं कर सकता। यह केवल सिगरेट पीने के बारे में ही नहीं, ऐसा ही जीवन की सब चीजों के बारे में है: अपने आप को बदलने की बहुत कोशिश मत करो। इससे निशान छूट जाते हैं। अगर तुम बदल भी जाओ, तुम्हारा बदलाव सतह पर ही होगा। और तुम और कहीं इसका विकल्प ढूंढ लोगे; तुम्हें विकल्प ढूंढना पड़ेगा, अन्यथा तुम खालीपन अनुभव करोगे। जब कुछ अपने आप छूटता है क्योंकि तुम इस बेवकूफी के प्रति इतने शांत भाव से जाग गये कि किसी प्रयास की आवश्यकता ही नहीं रही, तो यह बस गिर जाती है, जैसे एक सूखा पत्ता पेड़ से गिर जाता है, यह अपने पीछे कोई निशान, कोई अहं नहीं छोड़ता। अगर तुम प्रयास से कुछ छोड़ते हो, तो यह बड़ा अहंकार पैदा करता है। तुम सोचने लगते हो, अब मैं एक बहुत ही पवित्र आदमी हूं, मैं सिगरेट नहीं पीता। अगर तुम सोचते हो कि सिगरेट पीना पाप है, तो स्वाभाविक है, साफ है कि अगर तुम इसे छोड़ते हो तुम सोचोगे कि तुम एक बहुत पवित्र आदमी हो। तुम्हारे सब पुण्यवान आदमी ऐसे ही हैं। कोई सिगरेट नहीं पीता, कोई शराब नहीं पीता, कोई दिन में एक ही बार खाता है, कोई रात में नहीं खाता, किसी ने रात में पानी पीना बंद कर दिया है…और वे सब महान संत हैं! ये संतत्व के लक्षण हैं, महान गुण हैं! हमने धर्म को इतना मजाक बना दिया है। इसने सारी महिमा खो दी है। यह इतना मूर्खतापूर्ण है जितने कि लोग। पर सारी बात तुम्हारे रुख पर निर्भर करती है: अगर तुम समझते हो कि कोई चीज पाप है, तो तुम्हारा पुण्य इसके विपरीत होगा। मैं इस पर जोर देता हूं: सिगरेट ना पीना कोई पुण्य नहीं है, सिगरेट पीना कोई पाप नहीं है, जागरुकता पुण्य है, बेहोशी पाप है। और तब यही नियम तुम्हारे सारे जीवन पर लागू होगा।

— ओशो, आह दिस! , प्रवचन #6

 

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About Swami Devaishta

I am a osho sanyasi, yoga teacher and a homoeopath.
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