निम्बू कैंसर की चमत्कारिक दवा है……..

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निम्बू कैंसर की चमत्कारिक दवा है……..

’बाल्टीमोर’ के ’इंस्टीच्यूट ऑफ़ हेल्थ साईंस’ ने उद्घाटित किया है की निम्बू कैंसर की चमत्कारिक दवा है. कीमोथिरेपी से इसका प्रभाव दस हज़ार (१०,०००) गुणा अधिक होता है. कमाल तो यह है की इससे केवल कार्सिनोमा ( कैंसर के ) कोष ही मरते हैं, स्वस्थ कोशों को कोई हानि नहीं पहुँचती. जबकि कीमोथेरपी या कैसर की अन्य दवाओं से रोगी कोशों के साथ स्वस्थ कोष भी नष्ट हो जाते हैं. कई बार तो रोग से अधिक बुरा प्रभाव चिकित्सा का होता है. पर नीबू से ऐसा कोई बुरा प्रभाव नहीं होता.

# वैसे तो निम्बू का किसी भी रूप में प्रयोग करें, लाभ मिलेगा. एक सरल तरीका यह है की किसी पानी पीने के बर्तन में पीने का पानी डालें और उसमें निम्बू के २-४ पतले-पतले कतले (स्लाईस) डाल दें. पानी क्षारीय (एलक्लाईन) प्रभाव वाला होजायेगा. अब दिन भर इसी पानी का प्रयोग पीने के लिए करें. प्रतिदिन यही पानी बना कर पीयें. रोगी और स्वस्थ सभी को इस पानी को रोज़ पीना चाहिए. अनेक रोगों में लाभ मिलेगा, इसके इलावा सामान्य स्वास्थ्य को ठीक रखने में सहायता मिलेगी.

# खोजों से पता चला है की निम्बू के प्रयोग से १२ प्रकार के गले, स्तन, फेफड़ों, गुर्दे, अमाशय, आँतों, प्रोस्टेट, पैंक्रिया आदि के कैंसर ठीक हो सकते हैं. इसके इलावा इसके उचित प्रयोग से मानसिक तनाव, उच्च रक्तचाप, स्नायु रोगों में भी उल्लेखनीय लाभ होता है.

# *भारत में कई प्रकार के निम्बू के अचार बनाने का रिवाज़ सदियों पुराना है. स्वाद के साथ स्वास्थय रक्षा भी हो जाती थी. अब तो रेडीमेड अचार लिए जाते हैं जिनमें कई प्रकार के कैंसरकारक रसायन मिले रहते हैं. बाकी कसर प्लास्टिक के मर्तबान से पूरी हो जाती है. मिनरल बोतल तक में प्लास्टिक के विष घुल जाते हैं, यह वैज्ञानिक खोजों से स्पष्ट हो चुका है. खट्टे, नमकीन और तीखे पदार्थों में तो इसके विष और भी अधिक मात्रा में घुलते हैं. खटाई के कारण प्लास्टिक से लीच-आउट हुए डाईओक्सीन आदि घातक रसायनों से कैंसर पैदा होने की संभावनाएं कई गुणा बढ़ जाती हैं. अतः इन बाजारी अचार मुरब्बों के कारण कैंसर ठीक तो क्या होना, उलटे बढ़ता ही है. *गर्मियों के दिनों में निम्बू की शिकंजबी घर-घर में पी-पिलाई जाती थी. अनेक रोगों से अनायास ही रक्षा हो जाती थी. पर अब उसका स्थान कैंसरकारक कोक, पेप्सी आदि घातक कोल्डड्रिंक्स ने लेलिया है. पिछले एक साल से तो हालत यह है की बाज़ार में जो नीबू-सोडा हम पीते थे, वह भी विषाक्त हो गया है. पहले उसे पी कर ताज़गी लगती थी पर अब तो उसे पीने के बाद उल्टियां, सरदर्द, बेचैनी होने लगती है. सोडे में न जाने सक्रीन के इलावा और क्या-क्या विषैले रसायन डाले जाने लगे हैं. अतः वह भी काम का नहीं रहा.

* एक रोचक प्रसंग पाठकों को पसंद आयेगा और उपयोगी लगेगा. एक सेमिनार के आयोजन के लिए कुछ दिन पहले कृषि विश्व विद्यालय पालमपुर गए थे. बाज़ार में एक व्यक्ति से पूछ लिया की यहाँ कहीं पीने लायक अछा निम्बू-सोडा मिलेगा? आशा तो नहीं थी पर जवाब मिला की बसअड्डे पर अमुक दूकान पर जाओ, बहुत अच्छा सोडा मिलेगा पर लाईन में लगना पडेगा. अधिक विश्वास तो नहीं आया पर अपने मित्र रोहिताश जी के साथ वहाँ गये तो सचमुच लोग लाईन लगा कर सोडा खरीद कर पी रहे थे. हमें भी १० मिनेट लाईन में लगना पडा, पर पीकर मज़ा आ गया, जैसा की १-२ साल पहले आता था. एक घंटे बाद जाकर हमने फिर से वही सोडा-निम्बू पीया. पूछने पर पता चला की वह दुकानदार स्वयं सोडे की बोतलें बनाता- भरता है.

# सन १९७० से अब तक २० से अधिक प्रयोगशालाओं ने इस तथ्य का पता लगा लिया था की निम्बू अनेक प्रकार के कैंसर की चिकित्सा का एक शक्तिशाली उपाय है. अब एक सवाल यह है की हम लोग इस महत्वपूर्ण जानकारी से वंचित क्यूँ हैं ? असल में ये कम्पनियां इस जानकारी के आधार पर कृत्रिम रूप से निम्बू का कोई विकल्प तैयार करने का प्रयास कर रही हैं, ताकी वे कैंसर के रोगियों के इलाज से अकूत धन कमा सकें. लोग केवल निम्बू के प्रयोग से ठीक होने लगे तो इन्हें क्या लाभ ? इसलिए इस अद्भुत और करोड़ों लोगों की जीवन रक्षा करने वाली खोज को छुपा कर रखा गया. अब ये हम सोच लें की हमें अपना और अपनों का हित करना है या इन कंपनियों का ? इस जानकारी का स्रोत है : ’’इंस्टीच्युट ऑफ़ हैल्थ साईंस, 819 एल.एल.सी.,बाल्टीमोर, एम डी 1201

# सावधानी: *कुछ बातों का ध्यान रख कर ही निम्बू का प्रयोग करना उचित रहेगा. १* गठिया, दमें और सईनोसाईंटिस जैसे रोगियों को कोसे गर्म पानी में शहद के साथ निम्बू का प्रयोग कम मात्रा में करवा कर देखें. कोई समस्या न हो तभी अधिक मात्रा में प्रयोग करें. वैसे आशा है की पूरे दिन के पानी में २-४ निम्बू स्लाईस डाल कर उस जल का प्रयोग करने से कोई समस्या नहीं होगी. २*दूसरी सावधानी यह रखनी चाहिए की पानी का बर्तन यदि कांच या मिट्टी का हो तो अधिक अछा है. प्लास्टिक या एल्युमिनियम पात्र का प्रयोग तो भूल कर भी न करें. ताम्बे के पात्र में भी अधिक मात्रा में खटाई रखने से उसके गंभीर दुष्प्रभाव होते हैं. ३*तीसरी सावधानी यह है की निम्बू खरीदते समय यह देख लें की उसका आकार और सुगंध स्वाभाविक नीबू वाली है की नहीं ? हो सकता है की शक्तिशाली कंपनियों के प्रयास से विषाक्त निम्बू बाज़ार में उतारा जा चुका हो या उतार दिया जाये. जैसे की दूधि / घीया के बारे में हुआ. बाबा रामदेव के कहने पर लाखों लोगों ने घिया, तुलसी, निम्बू और काली मिर्च का प्रयोग किया. लाखों ह्रदय रोगी ठीक हो गए. उसके शायद एक या दो वर्ष बाद बाज़ार में ऐसी घीया आ गयी जिसका रस पीने से अनेक व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार पड़ने लगे. हमारे कुछ परिचित भी बुरी तरह से घीया का रस पीकर बीमार हुए और हस्पताल में भरते होना पडा. ऐसा तो आजतक कभी नहीं हुआ था ? मीडिया ने इसे इस प्रकार प्रचारित किया मानों बाबा रामदेव के बतलाये प्रयोग के कारण ऐसा हुआ. यह मौलिक और आवश्यक बात किसी नें नहीं उठाई की आखिर घीया से ऐसी हानि हुई क्यूँ ? सैंकड़ों या हजारों वर्ष से हम गंभीर रोगियों को भी घीया देते हैं तो हानि नहीं होती, अब ऐसा क्यूँ हुआ ? संदेह करने की गुजाईश है न की अरबों रुपया ह्रदय रोगों की दवाओं से कमाने वाली कंपनियों की सोची समझी साजिश इसके पीछे हो सकती है ? ठीक इसी प्रकार निम्बू के मामले में भी होने की आशंका को ध्यान में रख कर चलने में कोई बुराई नहीं. हो सके तो नीबू का एक वृक्ष घर में या फिर जगह न हो तो छत पर ड्रम में लगाने की संभावना पर सोचें ज़रूर.

## अंत में एक आग्रह है की इस जानकारी को अधिकतम लोगों तक पहुंचाने का प्रयास करें. 

source : http://www.pravakta.com/lime-to-treat-the-cancer-as-possible-dr-rajesh-kapoor#comment-43553

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About Swami Devaishta

I am a osho sanyasi, yoga teacher and a homoeopath.
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