आप हजारों लोगों को संन्यास क्यों दे रहे हो ?

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आखिरी सवाल : आप हजारों लोगों को संन्यास क्यों दे रहे हो?
23.11.1978 के प्रवचन का अंतिम प्रश्न !!
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ओशो : संन्यास का अर्थ जानते हो?
संन्यास का अर्थ है–मेरा अर्थ–जीवन को जीने की कला।
जीवन को सम्यक रूपेण जीना।
लोग जीना भूल गये हैं, इसलिए हजारों लोगों को संन्यास दे रहा हूँ।

लोग भूल ही गये हैं कि जीना कैसे।
और जिन्होंने भुलाने में सहयोग दिया है उन्हें अब तक संन्यासी समझा जाता रहा है।
इसलिए संन्यास नाम मैंने चुना, ताकि प्रायश्चित हो जाये। प्रायश्चित के निमित्त।
मैं कुछ और नाम भी चुन सकता था, मैं कोई और वस्त्र भी चुन सकता था,
लेकिन मैंने संन्यास ही नाम चुना और मैंने गैरिक वस्त्र ही चुने,
क्योंकि गैरिक वस्त्रों पर और संन्यास पर बड़ी कालिख लग गई है।
इनके कारण ही बहुत-से लोग जीवन का छंद भूल बैठे हैं, भगोड़े बन गये हैं।
इसी सीढ़ी से भागे हैं, इसी सीढ़ी से वापिस लाना है।
और संन्यास के नाम पर जो कालिख लगी है उसको मिटा देना है।
संन्यास को अब नाचता हुआ, आनन्द मग्न रूप देना है।
संन्यास को एक नया संस्कार देना है, एक नई संस्कृति देनी है।

अब जिसे मैं संन्यास कह रहा हूं
उसका पुराने संन्यास से कुछ भी लेना-देना नहीं है, वह उसके ठीक विपरीत है।
इसलिए अगर पुराने संन्यासी
मुझसे नाराज हों तो तुम आश्चर्य न करना, स्वाभाविक है।
उन्होंने तो कभी सोचा ही नहीं है कि ऐसा भी संन्यास हो सकता है।
संन्यास, जो संसार में पैर जमाकर खड़ा हो;
संन्यास, जो घर, परिवार, प्रिजयनों के विपरीत न हो।
संन्यास के नाम पर कितने घर उजड़े हैं, तुम्हें पता है?
लुटेरों ने इतने घर नहीं उजाड़े, हत्यारों ने इतनी स्त्रियों को विधवा नहीं किया है,
दुष्टों ने इतनी माताओं को रोता नहीं छोड़ा है–जितना संन्यासियों ने।
मगर अच्छे नाम के पीछे कुछ भी चले, छिप जाता है, नाम भर अच्छा हो।
तो तुम रो भी नहीं सकते।

कोई संन्यासी हो गया घर-द्वार छोड़कर, अब पत्नी रो भी नहीं सकती।
देखते हो, कैसी तुमने गर्दन कस दी है लोगों की!
पत्नी को लोग समझायेंगे: तू धन्यभागी है,
कि तुझे ऐसा पति मिला जो संन्यासी हो गया!
अब यह पत्नी आँटा पीसेगी, कि चक्की चलायेगी, रोती रहेगी;
मगर यह अपने आँसुओं को वाणी न दे सकेगी।
यह किसी से कह भी न सकेगी
और पतिदेव कभी अगर नगर में आयेंगे,
संन्यस्त हो गये हैं अब, तो उनके चरण छुएगी
और ऊपर-ऊपर मानेगी कि धन्यभागी हूँ मैं और भीतर जानेगी अभागी हूँ ।
इसके बच्चे अनाथ हो गए।
और कौन जाने कितनी स्त्रियाँ वेश्याएँ न हो गई होंगी
और कितने बच्चे भिखमंगे न हो गए होंगे, कितने बच्चे गैर-पढ़े-लिखे न रह गए होंगे,
कितने बच्चों को दवा न मिली होगी और मर न गए होंगे!
कितने माँ-बाप बुढ़ापे में असहाय न हो गए होंगे,
उनके हाथ की लकड़ी न छूट गई होगी।

तुम जरा देखो तो, अगर संन्यास के नाम पर हुआ जो अब तक का भगोड़ापन है,
हजारों साल का, उसका हिसाब लगाया जाये तो
हिटलर और तैमूरलंग और चंगीज खाँ और नादिरशाह और महमूद गजनवी,
इन सबने जो भी अत्याचार ढाये, सबके इकट्ठे भी जोड़ लो तो उनका कुल जोड़
संन्यास के द्वारा हुए अत्याचारों के मुकाबले कुछ भी नहीं है।
मगर बात अच्छी है। झंडा संन्यास का है,
उसके पीछे सब छिप जाता है, सब खून छिप जाते हैं।

मैं इस सारी कहानी को नया ढंग देना चाहता हूँ ।
संन्यास को मैं पहली बार पृथ्वी के प्रेम में संलग्न करना चाहता हूँ ,
क्योंकि मेरे लिये पृथ्वी और परमात्मा में भेद नहीं है, अभेद है।
यह एक महत क्रांति है, जो घट रही है।
पृथ्वी का संगीत खो गया है, आनन्द खो गया है।
जीवन की रसधार छिन्न-भिन्न हो गई है।
तुम्हें ऐसी बातें सिखाई गई हैं जिनके कारण तुम ठीक से जी ही नहीं सकते।
तुम्हें जीवन-विरोध सिखाया गया है, जीवन-निषेध सिखाया गया है।
तुम्हें आत्मघाती वृत्तियों की निरंतर उपदेशना दी गई है।
तुम नाच भूल गये हो। तुम गीत भूल गये हो।
वीणा पड़ी है तुम्हारे हृदय की और तुम तार नहीं छेड़ते।
संन्यास एक नई झंकार को जन्म देना है।

“ क्यों कस रहे हो तार को?
क्या जन्म देना है नई झंकार को?
कहीं पर कुछ शिथिल करते
और कर कसते कहीं;
नियति के कर कौन चालित
कर रहा, यदि तुम नहीं?
नियति धरती रही किसके हेतु
साज-सिंगार को?
क्यों कस रहे हो तार को?
क्या जन्म देना है नई झंकार को?

अवनि की तूंबी बनी है,
गगन के परदे लगे;
प्राण का है तार, जिसमें
नित्य नूतन स्वर जगे;
लिए बैठी गोद में यों
नियति सृष्टि-सितार को!
क्यों कस रहे हो तार को?
क्या जन्म देना है नई झंकार को?

विलंबित बेकल अँगुलियाँ
खोजती झंकार को;
नाद के हे सिन्धु , अब तो
बिन्दु की बौछार हो!
मिला दो स्वर लोक में अब
सार और असार को!
क्यों कस रहे हो तार को!
क्या जन्म देना है नई झंकार को?”

हाँ , निश्चय ही, जन्म देना है नई झंकार को।
संन्यास तुम्हारे तारों का कसना है।

मिला दो स्वर लोक में अब
सार और असार को!

पृथ्वी और परमात्मा को, देह और आत्मा को,
सार और असार को मिला देना है।
एक ही संगीत का अंग बना देना है।
स्थूल वीणा पर सूक्ष्म संगीत उठता है, विरोध नहीं है।
दोनों में तालमेल है। दोनों में एक का ही विस्तार है।

“अवनि की तूंबी बनी है,
गगन के परदे लगे;
प्राण का है तार, जिसमें
नित्य नूतन स्वर जगे;
लिए बैठी गोद में यों
नियति सृष्टि-सितार को!
क्यों कस रहे हो तार को?
क्या जन्म देना है नई झंकार को?”

प्रकृति लिए बैठी है सितार को अपनी गोदी में और तुम भूल गए बजाना।
तुम्हें याद ही न रही। तुम्हारा तारों से सम्बन्ध ही छूट गया।
तुम्हारी अंगुलियों की कला जाती रही।
तुम्हारे पास पैर हैं, पैरों में छिपी नाच की क्षमता है, उसे जगाना है।

संन्यास इस जगत को फिर से एक उत्सव बनाने की कला है।
इसलिए हजारों-हजारों को संन्यास दूंगा। रंग देना है सारी पृथ्वी को बसन्त के इस रंग से।
गैरिक रंग बसन्त का रंग है। मधुमास लाना है पृथ्वी पर, इसलिये संन्यास दे रहा हूँ ।

पर याद रखना, भूलकर भी मेरे संन्यास को पुराने संन्यास से एक मत समझ लेना।
यह बात ही और है। यह आयाम ही और है। मगर प्रवेश करोगे तो ही स्वाद पा सकोगे।
अब तुमने पूछा है तो
जरूर तुम्हारे मन में भी संन्यास लेने की कहीं-न-कहीं छिपी हुई कोई कामना होगी,
नहीं तो पूछते ही क्यों? कहीं सुगबुगाता होगा कोई बीज टूटने को।
कहीं आतुर हो गई होगी कोई बात। कोई तार तुम्हारे भीतर भी झनझना उठा होगा।

और जानने का एक ही उपाय है: होना।
संन्यास कोई ऐसी बात नहीं कि
तुम बाहर-बाहर दर्शक की तरह खड़े होकर देखते रहो, पूछते रहो,
हजारों लोगों को संन्यास मैं क्यों दे रहा हूँ?
जरा यह भी तो पूछो कि हजारों लोग संन्यास क्यों ले रहे हैं!
जरूर हजारों लोगों के हृदय में कुछ बज उठा होगा।
मैंने उनके तार कहीं छू दिये हैं।

वही व्यक्ति सम्यक रूपेण जीता है जो परमात्मा को जान लेता है
और वही सम्यक रूपेण मरता है जो परमात्मा को जानकर मरता है।

आज इतना ही।

साभार : Swami Prabhu Chaitanya
ताकि सनद रहे ! 23.11.1978 के प्रवचन का अंतिम प्रश्न !!
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ओशो : सहज योग # 03(सरहपा)
23.11.1978

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About Swami Devaishta

I am a osho sanyasi, yoga teacher and a homoeopath.
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