वस्तुतः मन ही रोग है. मन से मुक्ति ही स्वास्थ्य है…….

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मन से मन को नही जाना जा सकता.
जिस तरह आँखों से आँखों को नहीं देखा जा सकता.
मन को वही जानता है या जान सकता है जो मन के पार हो.
अन्यथा मन कभी भी स्वयं की पोल नही खोलता.
मन एक गोल चक्र का नाम है- इसे ही संसार कहा गया है.
संसार का शाब्दिक तात्पर्य है- गोल चक्कर!
बुद्ध के अतिरिक्त मन को जानने का दावा करने वाला मन के ही उलझाव में रेंग रहा है.
अनेक मनोवैज्ञानिक वस्तुतः मनोरोगी होते हैं.
मन जानने की चीज़ नही है. मन समझने की चीज़ है. और अंतिम बात यही समझ में आती है की मन है ही नही.
एक मनस चिकित्सक मनुष्य को ‘मन’ मान कर इलाज़ करता है- मनुष्य मन नही.
यह अप्रोच ही भ्रांतिपूर्ण है. और जब प्रारम्भ ही गलत तो अंत सदा गलत होगा ही.
मन के समायोजन का प्रश्न नही है- मन के विसर्जन का प्रश्न है.
मनोरंजन का नही मनोभंजन का प्रश्न है.
मनोवैज्ञानिक मनोरोग का इलाज़ करते हैं.
वस्तुतः मन ही रोग है.
मन से मुक्ति ही स्वास्थ्य है.
यह स्वास्थ्य स्वरूप में प्रतिस्थित होने से प्राप्त होता है.
मनोचिकित्सा व्यर्थ है.
मनोविज्ञान निरर्थक!
और मजा यह है की आधी दुनिया की ६० % आमदनी मनोविज्ञानिको के जेब में जा रही है.
ओशो के प्रवचनों पर आधारित
__________________________
अनन्या स्वास्तिका

 

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About Swami Devaishta

I am a osho sanyasi, yoga teacher and a homoeopath.
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