Your Body Speaks Your Mind: Decoding the Emotional, Psychological, and Spiritual Messages That Underlie Illness

सभी चिकित्सक बंधू के लिए पठनिये

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महावीर वाणी (भाग–1) प्रवचन–18

ध्यान और कायोत्सर्ग

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ताओ उपनिषाद (भाग–3) प्रवचन–50

ताओ की परिभाषा —

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ताओ उपनिषाद (भाग–1) प्रवचन–20

ईगो-सेंट्रिक – मैं-केंद्रित, जीवन…..

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जिने हेतु सिर्फ़ धन काफी नहीं ,जिने की कला चाहिए

महावीर ने कहा नही The whole thing is that सबसे बडी Life है । हम है हमारा जीवन है । हमारी जीवन शैली है । हमारी सहजता है । प्रकृति है ।

उठो! जागो!

मैं एक सत्य घटना से अपनी बात प्रारम्भ करना चाहता हूं । सन् 1923 अमेरिका में – शिकागों के एजवाटर बीच पर तब के सबसे अमीर 9 व्यापारी एकत्रित हुए। जिनका कुल जमा धन दुनिया की कुल पूंजी का 50ः से अधिक था ।
एक शोधकर्ता ने 25 वर्ष बाद उन सबकी वापस खोज की गई तब उनकी स्थिति निम्न प्रकार पाई गई ।
धनिक का नाम                                व्यवसाय                                                             25 साल बाद परिणाम
1. चाल्र्स श्वाब                             स्टील कम्पनी के मुख्यिा                        …

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भगवान बुध्द ने प्रतीत्य-समुत्पाद में अनुलोम कि परिभाषा में ‘सनातन’ क्या है —–

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भगवान बुध्द ने क्या खोजा (Invention) ? और सनातन किसे कहते है !

वैदिकब्राम्हणहिन्दुत्वादी ‘सनातन’ शब्द को लेकर बडे अभिमानी है । लेकिन इन्हे या इनके प्रतिष्ठीत धार्मीक आचार्या से कभी पुछता हु कि अंत: ‘सनातन’ क्या है? 100% ‘सनातन’ वादीयों को अश: मात्र भी जानकारी नही है । यह स्थिती वैदिकब्राम्हणहिन्दुत्व कि है। पंरतू ‘सनातन’ को लेकर शेखी बहोत मारते। वास्तविक ‘सनातन’ इस शब्द‍ का वेदिकब्राम्हणहिन्दुत्व से या अन्य किसी धार्मिक रितिरिवाजों से या उनके साहित्य से दुर परे संबंध नही है। यह सब प्राकृतीक (Law of Universal) है।

भगवान बुध्द ने प्रतीत्य-समुत्पाद में अनुलोम कि परिभाषा में ‘सनातन’ क्या है ? उसे समझाया है।
अनुलोम –
1) अविद्या के प्रत्यय (कारण) से संस्कार उत्पन्न होते है ।
2) संस्कार के प्रत्य‍य से विज्ञान (चेतना) उत्पन्न‍ होते है।
3) विज्ञान के प्रत्यय से नाम-रूप (मन और शरिर) उत्पन्न होते है।
4) ‘नाम-रूप’ के प्रत्‍यय से छ:-आयतन (छ:-इंद्रिया) उत्पन्न होते है।
5) छ:-आयतन के प्रत्‍यय से स्‍पर्श (बाहर के विषय इंद्रियों को स्पर्श करना) उत्पन्न होते है।
6) स्‍पर्श के प्रत्‍यय से वेदना उत्पन्न होती है।
7) वेदना के प्रत्यय से तृष्णा‍ उत्पन्न होती है।
8) तृष्णा के प्रत्यय से उपादान उत्पन्न होता है।
9) उपादान के प्रत्यय से भव उत्‍पन्‍न होता है।
10) भव के प्रत्यय से जाति (जन्म‍) होता है।
11) जाति (जन्म‍) के प्रत्यय से दुख: उत्प‍न्न होता है।
12) दुख: जैसे जन्म‍, बुढापा, मरना, शोक, रोना, पीटना, बैचैन, परेशान होना इस प्रकार के यह सभी दुख: है।

मानवजिवन धरती पर था और जबतकर रहेंगा तबतक अविद्या से दुख होंगा ही, यह था और है एंव रहेंगा अर्थात दुखचक्र सनातन है। इस प्रकार के 12 दुखचक्र कि धारा ही ‘सनातन’ है। अगर आप उपर कि ‘तृष्‍णा’ पर नियंत्रन करना सिख लेते है तो क्या होंगा ?

भगवान बुध्द प्रतिलोम में तृष्णा पर नियंत्रन करने से क्या होंगा ? यह समझाते है।

1) अविद्या के संपुर्णता रूक जाने से संस्कार रूक जाते है।
2) संस्कार रूक जाने से विज्ञान रूक जाता है।
3) विज्ञान रूक जाने से नाम-रूप रूक जाता है।
4) नाम-रूप रूक जाने से छ:-आयतन रूक जाते है।
5) छ:-आयतन के रूक जाने से स्‍पर्श रूक जाता है।
6) स्‍पर्श रूक जान से वेदना रूक जाती है।
7) वेदना के रूक जाने से तृष्णा रूक जाती है।
8) तृष्णा के रूक जाने से उपादान रूक जाता है।
9) उपादान के रूक जाने से भव रूक जाता है।
10) भव के रूक जाने से जन्‍म होना रूक जाता है।
11) जन्म रूक जाने से दुख: रूक जाता है।
12) दुख रूक जाने से बुढापा, मरना, शोक, रोना, पीटना, बैचैन, परेशान होना यह सब रूक जाते है।

अर्थात उप्‍पर के 12 अनुलोम सनातन ‘दुख:चक्र’ है! और निचे के 12 प्रकारके प्रतिलोम कि खोज भगवान बुध्द कि थी जिसे कहा जाता है दुख:मुक्ति का ‘धम्मचक्र प्रर्वतन’। और धम्मचक्र यह दुखचक्र पर उपाय है’। दुख:चक्र सनातन ही रहेंगा यह किसी परम्परा से संबधीत नही है यह यूनिवर्सल कानुन है यह कुदरत का कानुन है। इस ‘दुखचक्र’ से मुक्ति के मार्ग को खोजने के लिये अनगिनत कल्पों तक बोधिस्तव अपनी पारमीताओं को पूरा करते है और स्वयम दुखों: से मुक्त होते है तब वह कहलाते है ‘सम्यक-सम्बुध्द’ इस खोज पर अधिपत्य मात्र ‘श्रमण संस्कृती के ‘श्रमणों’ का ही है। वैदिकब्राम्हणहिन्दु’त्व या अन्‍य परम्‍परा में दुखमुक्ति का मार्ग नही खोज सकते, यह निसर्ग का नियम है।

source : https://www.facebook.com/photo.php?fbid=599195930189783&set=a.114482368661144.18787.100002981450519&type=1&theater

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Discover the Habits of Exceedingly Healthy People – स्वास्थ्य को संजोनेवाले उपाय

सतत तनाव में रहनेवालों का स्वास्थ्य खराब होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है.

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A Silent Debate : मौन शाश्त्रार्थ

मौन शाश्त्रार्थ

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किडनी को ख़राब करने वाली आदतें…….

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किडनी की बीमारियां

किडनी की बीमारियां एवं किडनी फेल्योर पूरे विश्व एवं भारत में खतरनाक तेजी से बढ़ रहा है। भारत में प्रत्येक 10 में से एक इंसान को किसी ना किसी रूप में क्रोनिक किडनी की बीमारी होने की संभावना होती है। हर साल करीब 1,50,000 लोग किडनी फेल्योर की अंतिम अवस्था के साथ नये मरीज बनकर आते हैं, जिन्हें या तो डायलिसिस या किडनी प्रत्यारोपण की आवश्यकता होगी। कुछ आम आदतें किडनी की सेहत बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार होती हैं तो चलिये जानते हैं किडनी को ख़राब करने वाली आदतों के बारे में।
किडनी का महत्व

किडनियां (गुर्दे) हमारे शरीर में ख़ून से विषैले पदार्थों और अनावश्यक पानी को साफ करती हैं, साथ ही सारे टॉक्सिन्स मूत्र के माध्यम से शरीर से बाहर निकालने में मदद करती हैं। यदि किडनी ठीक न हो, तो रक्त शुद्ध नहीं होगा और सेहत खराब हो जाएगी।
पानी कम पीना

पानी कम मात्रा में पीने से किडनियों को नुक़सान हो सकता है। पानी की कमी के चलते किडनी और मूत्रनली में संक्रमण होने का ख़तरा अधिक हो जाता है। जिससे पोषक तत्वों के कण मूत्रनली में पहुंचकर मूत्र की निकासी को बाधित करने लगते हैं। साथ ही किडनी में स्टोन की आशंका भी बढ़ जाती है। इसलिए दिनभर में क म से कम 2 से 3 लीटर पानी पीने की सलाह दी जाती है।
धूम्रपान एवं तम्बाकू सेवन

धूम्रपान एवं तम्बाकू का सेवन से कई गंभीर समस्याएं तो हो ती ही हैं (विशेषकर फेफड़े संबंधी रोग) लेकिन इसके कराण ऐथेरोस्कलेरोसिस रोग भी होता है। जिससे रक्त नलिकाओं में रक्त का बहाव धीमा पड़ जाता है और किडनी में रक्त कम जाने से उसकी कार्यक्षमता घट जाती है। इसलिए धूम्रपान और तंबाकू का सेवन ना करें।
सुबह उठकर पेशाब ना जाना

देखिये रात भर में मूत्राशय पूरी तरह मूत्र से भर जाता है, जिसे सुबह उठते ही खाली करने की ज़रूरत होती है। लेकिन जब आलस की वज़ह से लाग मूत्र नहीं त्यागते और काफी देर तक उसे रोके रहते हैं तो आगे चलकर यह किडनी को भारी नुकसान पहुंचाता है।
नमक का अधिक सेवन

यह सत्य है कि नमक हमारे भोजन के स्वाद को बढाता है, लेकिन अधिक मात्रा में इसका सेवन उल्टा प्रभाव ड़ालता है। हमारे द्वारा भोजन के माध्यम से खाया गया 95 प्रतिशत सोडियम गुर्दों द्वारा मेटाबोलाइज़्ड होता है। इसलिए नमक का अनावश्यक रूप से अधिक मात्रा में सेवन गुर्दों की क्रियाशीलता को बढ़ाकर उनकी शक्ति को क्षीण करता है।
हाई बीपी के इलाज में लापरवाही

उच्च रक्तचाप अर्थात हाई बीपी के इलाज में लापरवाही किडनी समस्या का बड़ा कारण होती है। इसलिए हमेशा उचित समय पर अपना बीपी नापकर नियंत्रित रखें क्योंकि यह क्रोनिक किडनी की बीमारियों के लिये दूसरे नंबर पर आने वाला कारण होता है।
शुगर के इलाज में कोताही करना

मधुमेह के शिकार लगभग तीस प्रतिशत लोगों को किडनी की बीमारी हो ही जाती है और किडनी की बीमारी से ग्रस्त एक तिहाई लोग मधुमेह पीड़ित हो जाते हैं। इससे यह बात तो तय है कि इन दोनों समस्याओं का आपस में ताल्लुक है। इसलिये खून में शक्कर की मात्रा को नियंत्रित रहना आवश्यक होता है। साथ ही खान-पान को भी नियंत्रित रखना चाहिए।
ज्यादा मात्रा में पेनकिलर लेना

डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं की खरीद से बचें। बिना डॉक्टर की सलाह के दुकान से पेनकिलर दवाएं खरीदकर उनका सेवन किडनी के लिये खतरनाक हो सकता है। सामान्य दवाएं जैसे नाम स्टेरराईट एंडी इन्फेलेमेटरी दवाएं (इब्यूप्रोफेन) आदि के नियमित रूप से सेवन करने से वे किडनी को नुकसान पहुंचा कर पूरा तरह खराब भी कर सकती है।
अन्य नुकसानदेह आदतें

किडनी को खराब करने में कुछ अन्य आदतें जैसे, बहुत ज्यादा शराब पीना, पर्याप्त आराम न करना, सॉफ्ट ड्रिंक्स और सोडा ज्यादा लेना, देर तक भूखा रहना या दूषित भोजन करना, हाईपरटेंशन का इलाज ना कराना तथा बहुत ज्यादा मांस खाना भी कुछ ऐसी आदते हैं जिनकी वजह से किडनी को भारी नुकसान पहुंचता है।
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The Mechanics of Human Suffering……….

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The Mechanics of Human Suffering……….

There are two ways people can suffer. Generally, people think in terms of physical suffering and mental suffering. Physical suffering could be caused in different ways but 90% of human suffering is mental, which is caused within ourselves. People create suffering for themselves everyday – suffering anger, fear, hatred, jealousy, insecurity and so many other things. This is the maximum suffering in the world.

Why is humanity suffering? Let us understand the mechanics of suffering. Today morning, did you see that the sun came up wonderfully well? The flowers blossomed, no stars fell down, the galaxies are functioning very well. Everything is in order. The whole cosmos is happening wonderfully well today but just a worm of a thought worming through your head makes you believe it is a bad day today. Suffering is happening essentially because most human beings have lost perspective as to what this life is about. Their psychological process has become far larger than the existential process, or to put it bluntly, you’ve made your petty creation far more important than the Creator’s creation. That is the fundamental source of all suffering. We have missed the complete sense of what it means to be alive here. A thought in your head or an emotion within you determines the nature of your experience right now. The whole creation is happening wonderfully well but just one thought or emotion can destroy everything. And your thought and emotion may have nothing to do even with the limited reality of your life.

What you call as “my mind” is not yours actually. You don’t have a mind of your own. Please look at it carefully. What you call as “my mind” is just society’s garbage bin. Anyone and everyone who passes by you stuffs something into your head. You really have no choice about whom to receive from and whom not to receive from. If you say, “I don’t like this person,” you will receive a lot more from that person than anyone else. You really don’t have a choice. If you know how to process and use it, this garbage is useful. This accumulation of impressions and information that you have gathered is only useful for survival in the world. It has got nothing to do with who you are.

From Psychological to Existential

When we talk about a spiritual process, we are talking about shifting from psychological to existential. Life is about the creation that is here, knowing it absolutely and experiencing it the way it is; not distorting it the way you want. If you want to move into existential reality, to put it very simply, you just have to see that what you think is not important, what you feel is not important. What you think has nothing to do with reality. It has no great relevance to life. It is just chattering away with nonsense that you have gathered from somewhere else. If you think it is important, you will never look beyond that. Your attention naturally flows in the direction of whatever you hold as important. If your thought and your emotion is important, naturally your whole attention will be right there. But that is a psychological reality. That has nothing to do with the existential.

Suffering is not showered upon us, it is manufactured. And the manufacturing unit is in your mind. It is time to shut down the manufacturing unit.

How chronic diseases are caused by the thoughts and emotions that we generate, which ultimately poison the chemical soup in our body….???

Questioner: Sadhguru, you mentioned in previous discourses that 70% of all illnesses are mind-created. If that is so, what would be the emotional and thought pattern behind it, and how to correct that?

Sadhguru:You sound like a disciple of Freud. Only recently, certain letters became public that showed how hollow this man was who is seen as the father of modern psychoanalysis. This is not the way to approach it.

To give you a simple analogy – suppose your right hand was acting funny, beating you up, strangling and torturing you every day – would this not be sickness? For sure it would be. That is exactly what your mind is doing. It is acting funny, hurting you, poking you, making you cry, making you suffer – is this not sickness? But too many people are with you – you can form an army of sick people. When there is an army in front of you, sick or otherwise, there is no point in arguing with them – just bow down to them and keep going. That is what most enlightened beings have done – they just closed their eyes and sat.

If you are soaked in this poisonous soup on a daily basis, how can you be well? Today, we only have limited control about what we eat, what we drink, what we breathe – all that is somewhat poisoned. The world is trying to poison you in some way, but if you are not only on industrial help but on self-help, depending upon how hard you strive, you will succeed. You know, “self-help is the best help.”

Ancient societies always saw disease as something wrong – a human being should not be in any state of illness. But modern societies are treating disease as normal, because there is a whole industry that thrives on it. One of the largest industries on the planet is pharmaceuticals, which means there is too much lousy soup. Every day, you have to add something to it to make it nice. If you are willing, we can make this into a wonderful soup, without external chemicals. Once your chemistry is in a fantastic state, to be blissful will be natural. That way, 70% of the ailments could vanish from the planet. For the remaining 30%, there are many external influences, which are not always in your control. But what you are doing from within can be 100% in your control.

If you are constantly creating a nasty chemistry within you, how is life within you supposed to understand you are seeking wellbeing? It will assume you like ailments and will give them to you. Some people may have a robust system that will take a lot of beating – some people will fall at the very first assault. But if you are poisoning your system from within through the thoughts and emotions that you generate, sooner or later, it will get you.

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